दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO अधिनियम से जुड़े एक आपराधिक अपील मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए सजा को कम कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य से अपराध तो सिद्ध होता है, लेकिन वह कानून में परिभाषित पैठ (penetration) वाले अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
यह फैसला 15 जनवरी 2026 को सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 28 जून, 2016 का है, जब दिल्ली के तुगलकाबाद इलाके में एक छोटे से क्लिनिक के अंदर एक नौ वर्षीय बच्ची के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया गया था। आरोपी मधु शुधन दत्तो, जिसे स्थानीय रूप से "बंगाली डॉक्टर" के रूप में जाना जाता है, के पास बच्ची अपनी छोटी बहन के लिए दवा लेने गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, बच्ची को गलत तरीके से क्लिनिक के अंदर बंद कर दिया गया और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया।
उसकी मां कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुंची और शोर मचाया, जिसके बाद पुलिस को बुलाया गया। उसी दिन एफआईआर(FIR) दर्ज की गई और ट्रायल कोर्ट ने बाद में आरोपी को POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया और उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई, साथ ही गलत तरीके से कैद करने के लिए अलग से सजा भी सुनाई।
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कोर्ट की टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर सजा वाले मामलों में कानून की परिभाषाओं का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने प्रारंभिक शिकायत, मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान और ट्रायल के दौरान दिए गए बयान का तुलनात्मक अध्ययन किया।
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कोर्ट ने पाया कि शुरुआती बयानों में पैठ से संबंधित स्पष्ट आरोप नहीं थे। प्रारंभिक विवरण से यह संकेत मिलता है कि अपराध की प्रकृति यौन हमला की है, लेकिन वह POCSO अधिनियम में परिभाषित पैठयुक्त अपराध के दायरे में नहीं आती।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह सिद्ध होता है कि अपराध हुआ है, लेकिन वह धारा 3 के तहत पैठयुक्त यौन अपराध की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।”
मेडिकल रिपोर्ट को लेकर उठी आपत्ति पर कोर्ट ने कहा कि संबंधित डॉक्टर की अनुपलब्धता के बावजूद रिपोर्ट को कानूनन सही तरीके से सिद्ध किया गया है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला POCSO अधिनियम की धारा 9(m) के अंतर्गत आता है, जो 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे के साथ गंभीर यौन हमला से संबंधित है, न कि धारा 6 के अंतर्गत आने वाले पैठयुक्त अपराध से।
इस आधार पर कोर्ट ने दोषसिद्धि की धारा में संशोधन करते हुए सजा को 10 वर्ष से घटाकर 7 वर्ष कर दिया, जो कि धारा 10 के तहत निर्धारित अधिकतम सजा है। भारतीय दंड संहिता के तहत दी गई सजा को यथावत रखा गया।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पीड़ित को दी जाने वाली वैधानिक क्षतिपूर्ति शीघ्र जारी की जाए।
अंतिम निर्णय
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया। ट्रायल कोर्ट के निर्णय में आवश्यक कानूनी संशोधन करते हुए सजा में कमी की गई और सभी लंबित आवेदनों को बंद कर दिया गया।
Case Title:- Madhu Shudhan Dutto v. State Govt. Of Nct Of Delhi
Case No.:- CRL.A. 649/2025










