दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि वयस्कों के बीच बना सहमति वाला रिश्ता अगर बाद में टूट जाए, तो उसे अपने आप आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा की एकल पीठ ने बलात्कार और SC/ST अधिनियम के तहत दर्ज FIR को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत रिश्तों की विफलता का बदला लेने के लिए नहीं किया जा सकता
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला डॉ. अवधेश कुमार बनाम राज्य (NCT दिल्ली) से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि 3 अप्रैल 2023 को आरोपी ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए और जातिसूचक टिप्पणी की। इस आधार पर सितंबर 2023 में वजीराबाद थाने में IPC की धारा 376 (बलात्कार) और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत FIR दर्ज की गई।
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शिकायतकर्ता का कहना था कि दोनों की पहचान कई वर्षों से थी और आरोपी ने शादी का आश्वासन देकर उसका शोषण किया। वहीं, आरोपी ने FIR को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि दोनों के बीच लंबा सहमति वाला रिश्ता था, जिसे बाद में आपराधिक मामला बना दिया गया।
अदालत के समक्ष दलीलें
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि महिला के साथ संबंध पूरी तरह सहमति से थे और व्हाट्सऐप चैट्स से यह साफ झलकता है। यह भी कहा गया कि शिकायत में कई अहम तथ्यों को छुपाया गया, जैसे पहले भी महिला का आरोपी के साथ रहना।
वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि आरोप गंभीर हैं और ट्रायल के स्तर पर ही उनकी जांच होनी चाहिए।
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अदालत के अवलोकन
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने FIR दर्ज करने में लगभग पांच महीने की देरी, मेडिकल साक्ष्य की कमी और दोनों पक्षों के बीच लगातार संवाद को महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने कहा,
“लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते के टूटने मात्र से उसे बलात्कार का मामला नहीं बनाया जा सकता।”
व्हाट्सऐप चैट्स के संदर्भ में पीठ ने पाया कि बातचीत में न तो जबरदस्ती का संकेत है और न ही शादी का कोई स्पष्ट झूठा वादा। अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता द्वारा अपना मोबाइल फोन जांच के लिए पेश नहीं करना एक महत्वपूर्ण परिस्थिति है।
SC/ST एक्ट के आरोपों पर अदालत ने कहा कि केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि पीड़िता अनुसूचित जाति से है; यह भी साबित होना चाहिए कि कथित अपराध केवल उसकी जाति के कारण किया गया। इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला।
न्यायालय का निर्णय
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला दो वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्ते का है, जो बाद में टूट गया। अदालत ने माना कि FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अंततः, दिल्ली हाईकोर्ट ने FIR संख्या 904/2023 और उससे उत्पन्न सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
Case Title: Dr. Avadesh Kumar v. State (NCT of Delhi) & Another
Case Number: CRL.M.C. 3/2025










