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वकील न्यायालय के अधिकारी होते हैं, न कि केवल मुवक्किल के प्रतिनिधि: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

दिनेश कुमार जिंदल बनाम ऋण वसूली न्यायाधिकरण, लखनऊ और अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि डीआरटी रजिस्ट्रार को एसएआरएफएईएसआई मामलों में नोटिस जारी करने का अधिकार है, अनुच्छेद 227 की चुनौती को खारिज करते हुए।

Shivam Y.
वकील न्यायालय के अधिकारी होते हैं, न कि केवल मुवक्किल के प्रतिनिधि: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) का रजिस्ट्रार, SARFAESI अधिनियम के तहत दायर सिक्योरिटाइजेशन आवेदन (SA) में नोटिस जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी है। अदालत ने इस आधार पर एक याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया, जिसमें रजिस्ट्रार की अधिकारिता को चुनौती दी गई थी। यह फैसला न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने DRT, लखनऊ में सारफेसी अधिनियम, 2002 की धारा 17 के तहत सिक्योरिटाइजेशन आवेदन संख्या 1144/2025 दाखिल किया था। 11 नवंबर 2025 को DRT के रजिस्ट्रार ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर 17 नवंबर 2025 को उपस्थित होकर यह बताने को कहा कि आवेदन क्यों स्वीकार न किया जाए।

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याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस तरह का नोटिस केवल DRT के प्रीसाइडिंग ऑफिसर ही जारी कर सकते हैं, न कि रजिस्ट्रार। उनका यह भी कहना था कि रजिस्ट्रार के समक्ष पेशी तय करने से मामले की सुनवाई में अनावश्यक देरी हुई।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने DRT (प्रक्रिया) नियम, 1993 के नियमों का विस्तृत विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार:

  • आवेदन रजिस्ट्रार के समक्ष ही प्रस्तुत किया जाता है।
  • रजिस्ट्रार को नोटिस जारी करने और सुनवाई की तारीख तय करने का अधिकार दिया गया है, बशर्ते वह प्रीसाइडिंग ऑफिसर के निर्देशों के अधीन हो।

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न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

“जब प्रक्रिया नियमों में रजिस्ट्रार को नोटिस जारी करने की शक्ति स्पष्ट रूप से दी गई है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि जिस देरी की शिकायत की गई थी, वह पहले ही समाप्त हो चुकी थी क्योंकि मामला 1 दिसंबर 2025 को प्रीसाइडिंग ऑफिसर के समक्ष सूचीबद्ध हो गया था। ऐसे में कोई वास्तविक कानूनी नुकसान सिद्ध नहीं हुआ।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप तभी किया जाता है, जब अधिकार क्षेत्र का गंभीर उल्लंघन या न्याय की स्पष्ट विफलता हो।
यह मामला केवल एक प्रक्रियात्मक आपत्ति तक सीमित था, जिससे कोई गंभीर अन्याय नहीं हुआ।

अदालत का अंतिम निर्णय

इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रार द्वारा जारी नोटिस वैध था और याचिका में कोई दम नहीं है।

अदालत ने याचिका को प्रवेश स्तर पर ही खारिज कर दिया और माना कि यह मामला अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप योग्य नहीं है।

Case Title:- Dinesh Kumar Jindal v. Debt Recovery Tribunal, Lucknow & Another

Case Number: Matters Under Article 227 No. 7466 of 2025

Date of Judgment: January 19, 2026

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