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बच्चों की भलाई सर्वोपरि, मां की अपील खारिज, पिता को मिली स्थायी कस्टडी: दिल्ली हाईकोर्ट

पत्नी (मां) बनाम पति (पिता) - दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिता को बच्चे की हिरासत देने के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा, माता-पिता के अलगाव का मुद्दा उठाया और बच्चे की हिरासत के मामले में मां की अपील खारिज कर दी।

Shivam Y.
बच्चों की भलाई सर्वोपरि, मां की अपील खारिज, पिता को मिली स्थायी कस्टडी: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक लंबे और संवेदनशील कस्टडी विवाद में स्पष्ट संदेश दिया है कि माता-पिता के अधिकारों से ऊपर बच्चों का कल्याण है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें दो नाबालिग बच्चों की स्थायी कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दिया गया था। मां की अपील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि मामले में “सुनियोजित पैरेंटल एलियनेशन” (एक अभिभावक द्वारा बच्चों को दूसरे अभिभावक से दूर करने की प्रवृत्ति) के स्पष्ट संकेत मिले हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

पति-पत्नी की शादी वर्ष 2011 में हुई थी। दोनों से एक बेटा और एक बेटी पैदा हुए। वैवाहिक विवाद के बाद मां बच्चों को लेकर अलग हो गईं और देश के अलग-अलग शहरों में रहीं। पिता ने आरोप लगाया कि उन्हें बच्चों से मिलने और संपर्क रखने से लगातार रोका गया। वहीं मां ने घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के आरोप लगाए।

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कई आपराधिक मामले भी दर्ज हुए, लेकिन बाद में कुछ मामलों में पिता और उनके परिवार को राहत मिली। अंततः बच्चों की कस्टडी से जुड़ा मामला फैमिली कोर्ट, पटियाला हाउस, दिल्ली पहुंचा, जिसने 1 जुलाई 2024 को बच्चों की कस्टडी पिता को देने का आदेश पारित किया। इसी फैसले को मां ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी

अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अनिल क्षेतरपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने कहा कि कस्टडी मामलों में “टेंडर ईयर्स डॉक्ट्रिन” यानी छोटी उम्र के बच्चों को स्वतः मां के पास रखने की धारणा अब हर मामले में लागू नहीं की जा सकती।

पीठ ने टिप्पणी की,

“आज के सामाजिक हालात में अदालतों को किसी पूर्वधारणा के बजाय बच्चों के सर्वोत्तम हित को केंद्र में रखना चाहिए।”

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अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों की बार-बार जगह बदलना, पिता से लंबे समय तक संपर्क तोड़ना और गंभीर आरोपों को बिना ठोस आधार के उठाना, बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अधिक आय या विदेश में नौकरी होना कस्टडी तय करने का अकेला आधार नहीं हो सकता

बच्चों की भलाई पर जोर

हाईकोर्ट ने दोनों बच्चों से व्यक्तिगत बातचीत भी की। कोर्ट का मानना था कि बच्चों की कुछ प्रतिक्रियाएं स्वतंत्र सोच की बजाय लंबे समय से बने माहौल का परिणाम हो सकती हैं।
पीठ ने कहा,

“एक अभिभावक द्वारा दूसरे को बच्चों के जीवन से पूरी तरह बाहर कर देना, अंततः बच्चों के ही खिलाफ जाता है।”

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अदालत ने भाई-बहन को अलग न करने की जरूरत पर भी जोर दिया और कहा कि साथ रहना उनके भावनात्मक विकास के लिए जरूरी है।

अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का मूल्यांकन करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने मां की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मां की भूमिका बच्चों के जीवन से खत्म नहीं होती। उनसे अपेक्षा की गई कि वे बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अन्य जरूरतों में सहयोग करें।

कोर्ट ने कहा कि कस्टडी का मतलब एक अभिभावक की जीत नहीं, बल्कि बच्चों के लिए स्थिर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना है

Case Title: Wife (Mother) vs Husband (Father)

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