नई दिल्ली की अदालत कक्ष संख्या में माहौल गंभीर था। वर्षों से चले आ रहे पारिवारिक विवाद ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामला सिर्फ संपत्ति का नहीं था, बल्कि भरोसे, पारिवारिक रिश्तों और कथित “सुलह पुरस्कार” की वैधता पर भी था।
दो भाइयों के नेतृत्व वाले परिवारों के बीच यह विवाद अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अदालत ने साफ कर दिया कि इस लड़ाई को बिना मुकदमे के खत्म नहीं किया जा सकता।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तमिलनाडु के एक बड़े कारोबारी परिवार से जुड़ा है। पिता द्वारा खड़ी की गई विशाल संपत्ति और व्यवसाय के बंटवारे को लेकर चार भाई-बहनों में मतभेद उभरे।
दो भाई पहले ही मध्यस्थता के जरिए अलग हो चुके थे। बचे हुए दो - वैकुंदराजन और जेगथीशन - के परिवारों के बीच 31 दिसंबर 2018 को एक दस्तावेज तैयार हुआ, जिसे ‘कैथाडी बागा पिरिविनै पथिरम’ (KBPP) कहा गया।
इसके कुछ दिन बाद, 2 जनवरी 2019 को एक और दस्तावेज सामने आया, जिसे “सुलह पुरस्कार” बताया गया। यहीं से विवाद गहराता चला गया।
विवाद की असली जड़
जेगथीशन पक्ष का कहना था कि KBPP पर उनसे जल्दबाजी में हस्ताक्षर कराए गए। बाद में जब उन्होंने बंटवारे को समझा, तो पाया कि संपत्ति का विभाजन असमान है।
उनका आरोप था कि तथाकथित सुलह पुरस्कार न तो विधि के अनुसार बना, न ही सभी पक्षों की मौजूदगी में। इसे उन्होंने “बाद में गढ़ा गया दस्तावेज” बताया।
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वहीं वैकुंदराजन पक्ष ने दलील दी कि दोनों दस्तावेज मिलकर एक वैध सुलह पुरस्कार बनाते हैं, जिसे अदालत के आदेश की तरह लागू किया जा सकता है।
निचली अदालतों का रुख
ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट ने जेगथीशन पक्ष का दीवानी मुकदमा शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया। अदालतों का मानना था कि एक बार दस्तावेज पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, तो अब अलग मुकदमा चलाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान पीठ ने दस्तावेजों और पुराने पत्राचार को गहराई से देखा।
पीठ ने स्पष्ट कहा कि,
“केवल हस्ताक्षर हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि दस्तावेज दबाव, प्रभाव या गलत प्रस्तुति से मुक्त है।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि कथित सुलह प्रक्रिया के बारे में शुरुआती पत्रों में कोई ठोस उल्लेख नहीं मिलता।
सुलह पुरस्कार पर सवाल
न्यायालय ने कहा कि यदि कोई सुलह पुरस्कार कानून के तहत बनाया गया है, तो उसकी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए।
यहां न तो विधिवत सुलह की प्रक्रिया दिखती है, न ही सभी पक्षों की सहमति स्पष्ट है।
पीठ ने टिप्पणी की,
“ऐसे गंभीर आरोपों को केवल प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।”
अदालत का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि:
• दीवानी मुकदमा बहाल किया जाए
• मुकदमे की पूरी सुनवाई हो
• तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर फैसला लिया जाए
इस तरह, परिवारिक संपत्ति विवाद में न्यायालय ने साफ किया कि सुलह पुरस्कार की वैधता और बंटवारे की निष्पक्षता पर खुली सुनवाई जरूरी है।
Case Title: J. Muthurajan & Anr. vs S. Vaikundarajan & Ors.
Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 16254 of 2025
Decision Date: 10 February 2026
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