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2012 के अग्निकांड से जुड़ी मौत के केस में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बाल गवाह की बयानबाजी में गंभीर खामियां पाकर आरोपियों को राहत दी

एस.के. मोरसेद अली और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य - कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2012 के जलने से हुई मौत के मामले में आजीवन कारावास की सजा को पलट दिया, जिसमें अविश्वसनीय बाल गवाहों, कमजोर चिकित्सा साक्ष्यों और जांच में खामियों का हवाला दिया गया।

Shivam Y.
2012 के अग्निकांड से जुड़ी मौत के केस में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बाल गवाह की बयानबाजी में गंभीर खामियां पाकर आरोपियों को राहत दी

करीब दस साल पुराने एक संवेदनशील आपराधिक मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और हत्या के आरोपों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा और मामले में गंभीर जांच संबंधी कमियां हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पूर्व मेदिनीपुर जिले से जुड़ा है। आरोप था कि विवाह के करीब 14 साल बाद महिला को उसके ससुराल पक्ष ने केरोसिन डालकर जला दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। निचली अदालत ने पति और अन्य ससुरालवालों को IPC की धारा 498A और 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। इसी फैसले के खिलाफ यह अपील दाखिल की गई थी।

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कोर्ट की अहम टिप्पणियां

दो सदस्यीय पीठ न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता ने सुनवाई के दौरान सबूतों की गहराई से जांच की। अदालत ने पाया कि पीड़िता की मौत शादी के सात साल बाद हुई थी, इसलिए दहेज मृत्यु का कानूनी अनुमान अपने आप लागू नहीं होता।

कोर्ट ने कहा,

“अभियोजन को हर तथ्य ठोस रूप से साबित करना था, लेकिन साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी और विरोधाभासी है।”

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अदालत ने विशेष रूप से बाल गवाहों की गवाही पर सवाल उठाए। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह ठीक से दर्ज ही नहीं किया कि बच्चों से कौन-से प्रारंभिक सवाल पूछे गए, जिससे यह तय हो सके कि वे सच और झूठ का फर्क समझते हैं या नहीं।

पीठ ने यह भी नोट किया कि:

  • इनक्वेस्ट रिपोर्ट में किसी आरोपी का नाम नहीं था।
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट और इनक्वेस्ट रिपोर्ट में जलने की प्रतिशत को लेकर विरोधाभास था।
  • जिन डॉक्टरों ने महिला का इलाज किया, उन्हें गवाही के लिए पेश ही नहीं किया गया।

कोर्ट के शब्दों में,

“जांच में ऐसी गंभीर चूकें हैं, जो अभियोजन की कहानी पर गहरा संदेह पैदा करती हैं।”

हाईकोर्ट ने FIR मजिस्ट्रेट के पास देर से पहुंचने पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि यह देरी अभियोजन की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। साथ ही, कई महत्वपूर्ण गवाहों को जानबूझकर पेश नहीं किया गया, जिससे पूरा मामला संदिग्ध हो गया।

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फैसला

सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत का दोषसिद्धि और सजा का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप “संदेह से परे” साबित नहीं हुए हैं।

इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि:

  • जेल में बंद सभी अपीलकर्ताओं को तुरंत रिहा किया जाए, यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
  • जमानत पर रिहा आरोपियों के बांड छह महीने बाद समाप्त माने जाएंगे।

इसी के साथ यह आपराधिक अपील स्वीकार कर ली गई और मामला समाप्त कर दिया गया।

Case Title: Sk. Morsed Ali & Others vs The State of West Bengal

Case Number: C.R.A. 130 of 2016

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