सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जब किसी डिक्री का पूरी तरह से निष्पादन हो चुका हो, तब उसके बाद सीपीसी की धारा 47 के तहत आपत्ति दायर नहीं की जा सकती। अदालत ने ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।
यह मामला अनंद चंद्र पांडा बनाम कलेक्टर, केओंझर से जुड़ा है, जिसमें जमीन के कब्जे और उसके क्रियान्वयन को लेकर विवाद था।
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मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 1983 में दायर एक सिविल सूट से शुरू हुआ था। अनंद चंद्र पांडा ने अपने स्वामित्व वाली भूमि को लेकर मुकदमा दायर किया था।
- वर्ष 1994 में ट्रायल कोर्ट ने उनका दावा खारिज कर दिया।
- इसके बाद 1999 में प्रथम अपीलीय अदालत ने आंशिक रूप से उनके पक्ष में फैसला दिया।
- अदालत ने खसरा नंबर 53 पर उनके हक, टाइटल और हित (right, title and interest) को मान्यता दी।
- हालांकि, मकान से जुड़ी अन्य मांगें खारिज कर दी गईं।
इसके बाद डिक्री के पालन के लिए Execution Case No. 8/2000 दायर किया गया।
निष्पादन की कार्यवाही और विवाद
26 अगस्त 2006 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने यह दर्ज किया कि:
- कोर्ट कमिश्नर की मौजूदगी में
- जमीन की माप कर
- डिक्री होल्डर को कब्जा सौंप दिया गया
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अदालत ने स्पष्ट कहा कि डिक्री पूरी तरह संतुष्ट हो चुकी है और कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई।
लेकिन इसके कुछ महीने बाद, राज्य सरकार ने Section 47 CPC के तहत आवेदन दायर कर आरोप लगाया कि गलत प्लॉट पर कब्जा दिला दिया गया है।
ओडिशा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील को स्वीकार कर लिया और कहा कि
धारा 47 के तहत याचिका सुनवाई योग्य है।
इसके खिलाफ डिक्री होल्डर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“जब एक बार निष्पादन की कार्यवाही पूरी हो जाए और डिक्री संतुष्ट हो जाए, तब उसके बाद धारा 47 के तहत कोई आपत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि:
- Section 47 केवल निष्पादन के दौरान उठने वाले विवादों पर लागू होती है
- निष्पादन समाप्त होने के बाद नहीं
- राज्य सरकार ने पहले कब्जा दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं की थी
- बाद में आपत्ति उठाना कानूनन स्वीकार्य नहीं है
अदालत ने इसे ‘approbate and reprobate’ यानी एक ही बात को पहले मान लेना और बाद में नकारना बताया।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने:
- ओडिशा हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया
- सिविल जज द्वारा पारित आदेश को निरस्त किया
- स्पष्ट किया कि Section 47 की अर्जी अवैध थी
- अपील को मंजूर कर लिया
- कोई लागत (cost) नहीं लगाई
Case Title: Ananda Chandra Panda (Dead) Through LRs vs Collector, Keonjhar
Case No.: Civil Appeal No. 1920 of 2011
Decision Date: 22 January 2026










