केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में थ्रिसूर जिले से बाहर रखने (बाहरीकरण) के मामले में हस्तक्षेप करते हुए अवधि कम कर दी। अदालत ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति को अधिकतम अवधि के लिए जिले से बाहर करने से पहले ठोस कारण दर्ज करना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला विजित नाम के 37 वर्षीय व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे पुलिस ने केरल एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 2007 के तहत “ज्ञात उपद्रवी” घोषित किया था। 31 जुलाई 2025 को डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, थ्रिसूर रेंज ने आदेश जारी कर विजित को एक वर्ष के लिए थ्रिसूर राजस्व जिले की सीमा में प्रवेश से रोक दिया था।
Read also:- फिजियोथेरेपिस्ट ‘डॉ.’ लिख सकते हैं नाम के आगे: केरल हाईकोर्ट ने मेडिकल डॉक्टरों की याचिकाएं खारिज कीं
यह आदेश विजित की कथित संलिप्तता के आधार पर पारित किया गया था, जिसमें तीन आपराधिक मामलों का हवाला दिया गया। इनमें से आखिरी मामला 23 अप्रैल 2025 का था, जो कोराट्टी पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था।
अदालत की टिप्पणियां
मुख्य न्यायाधीश डॉ. ए. के. जयशंकरन नांबियार और न्यायमूर्ति जोबिन सेबास्टियन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि बाहरीकरण जैसा आदेश व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डालता है।
Read also:- सार्वजनिक सड़क पर बने धार्मिक ढांचे को हटाने का आदेश: मद्रास हाईकोर्ट ने चेन्नई निगम को दी सख्त हिदायत
अदालत ने टिप्पणी की,
“ऐसा आदेश किसी नागरिक को न केवल एक जिले में आने-जाने से रोकता है, बल्कि उसे अपने घर और परिवार से भी दूर कर देता है। इसलिए अधिकतम अवधि तय करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।”
पीठ ने यह भी नोट किया कि आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि पूरे एक साल की पाबंदी क्यों जरूरी थी। अदालत ने कहा कि केवल कानून में अधिकतम अवधि का प्रावधान होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका कारण भी आदेश में झलकना चाहिए।
Read also:- मानहानि केस में मेधा पाटकर बरी: साकेत कोर्ट ने कहा– बयान साबित करने के लिए मूल वीडियो पेश नहीं हुआ
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि बाहरीकरण की अधिकतम अवधि लगाई जाती है, तो प्राधिकरण को अपने “मन के प्रयोग” यानी सोच-समझकर लिए गए निर्णय को लिखित रूप में दिखाना होगा।
पीठ ने माना कि पुलिस ने प्रक्रिया का पालन किया था, नोटिस दिया गया था और सुनवाई भी हुई थी, लेकिन अवधि तय करने के सवाल पर आदेश कमजोर था।
फैसला
अंत में, केरल हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश में संशोधन किया।
अदालत ने एक साल की बाहरीकरण अवधि घटाकर छह महीने कर दी, जो मूल आदेश की प्राप्ति की तारीख से लागू होगी।
Case Title: Vijith v. State of Kerala & Others
Case Number: WP(Crl.) No. 43 of 2026
Date of Decision: 19 January 2026










