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₹150 करोड़ के लेन-देन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI-ED जांच के आदेश, CIRP में गड़बड़ी पर सवाल

सौरभ अग्रवाल बनाम भारत संघ और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने ₹150 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन और CIRP में गड़बड़ी पर CBI, ED और SFIO को नोटिस जारी किया। जानिए पूरा मामला।

Vivek G.
₹150 करोड़ के लेन-देन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI-ED जांच के आदेश, CIRP में गड़बड़ी पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ₹150 करोड़ के कथित अवैध लेन-देन को लेकर CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और SFIO को नोटिस जारी किया। मामला एक लंबे समय से अटके कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) से जुड़ा है, जिसमें धोखाधड़ी, नियमों की अनदेखी और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर सवाल उठाए गए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका बंगाल कोल्ड रोलर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और ऑपरेशनल क्रेडिटर सौरभ अग्रवाल द्वारा दायर की गई है। मामला M/s KLSR Infratech Limited से जुड़ा है, जिसे 14 जुलाई 2023 को NCLT हैदराबाद ने दिवालिया प्रक्रिया में भेजा था।

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IBC के तहत जैसे ही CIRP शुरू हुई, कंपनी पर मोराटोरियम लागू हो गया और निदेशक मंडल निलंबित हो गया। एक अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) की नियुक्ति भी हुई। हालांकि, चार दिन बाद NCLAT चेन्नई ने कार्यवाही पर रोक लगा दी।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह रोक केवल प्रक्रिया पर थी, न कि NCLT के आदेश पर। इसके बावजूद निलंबित निदेशकों ने खुद को फिर से कंपनी के नियंत्रण में दिखाया।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच एजेंसियों को नोटिस जारी किया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दलील दी कि
“मोराटोरियम के दौरान बिना IRP की अनुमति के लगभग ₹150 करोड़ के कर्ज और चार्ज बनाए गए, जो कानून का खुला उल्लंघन है।”

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उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी का स्टेटस MCA पोर्टल पर “Active” दिखाया गया, जबकि कानूनन ऐसा संभव नहीं था।

30 महीने की देरी पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि NCLAT में अपील 30 महीने से अधिक समय से लंबित है, जबकि IBC कानून के अनुसार 330 दिन की सीमा तय है।

इस संदर्भ में Essar Steel मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि इतनी देरी से न केवल परिसंपत्तियों का मूल्य घटता है, बल्कि कानून का उद्देश्य भी विफल हो जाता है।

मामले ने उस समय गंभीर मोड़ लिया जब 13 अगस्त 2025 को NCLAT के एक सदस्य ने खुले कोर्ट में खुद को मामले से अलग कर लिया। उन्होंने बताया कि एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कथित तौर पर उनसे निलंबित निदेशकों के पक्ष में आदेश देने को कहा था।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि बाद में पारित आदेश में इस खुलासे का कोई जिक्र नहीं किया गया और कोर्ट रिकॉर्ड व वीडियो फुटेज देने से भी इनकार कर दिया गया।

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI, ED और SFIO को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही याचिका में उठाए गए आरोपों की जांच की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं।

पीठ ने संकेत दिया कि मामला केवल आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े सवाल भी शामिल हैं।

Case Title: Saurabh Agarwal v. Union of India & Ors.

Case No.: Writ Petition (Civil) – Details Awaited

Case Type: Insolvency / Constitutional

Decision Date: January 23, 2026

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