निर्माण अनुबंधों में विवाद समाधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम स्पष्टता दी है। अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में पहले ही आर्बिट्रेटर की नियुक्ति अदालत द्वारा हो चुकी हो और उसे चुनौती नहीं दी गई हो, तो बाद में उसी क्लॉज की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। यह फैसला राजस्थान हाउसिंग बोर्ड और एम/एस एमिनेंट कॉलोनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच चल रहे लंबे विवाद में आया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद जयपुर के प्रतापनगर सेक्टर-29 में आवास निर्माण परियोजना से जुड़ा है। कंपनी को 2009 में 40 हाई-इनकम ग्रुप मकान और 10 फ्लैट बनाने का ठेका दिया गया था। कंपनी का दावा था कि उसने तय समय से पहले काम पूरा कर दिया, लेकिन मजदूरी और निर्माण सामग्री की कीमत बढ़ने के कारण देय एस्केलेशन राशि का भुगतान नहीं किया गया।
कंपनी ने अनुबंध के क्लॉज-23 के तहत विवाद समाधान के लिए स्टैंडिंग कमेटी बनाने की मांग की। जब यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, तो कंपनी ने हाई कोर्ट में मध्यस्थ (Arbitrator) नियुक्त करने की मांग की।
हाई कोर्ट ने 2014 में सेवानिवृत्त जज को आर्बिट्रेटर नियुक्त किया, जिसके बाद मध्यस्थ ने कंपनी के पक्ष में भुगतान और ब्याज देने का आदेश दिया।
निचली अदालतों में क्या हुआ
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने आर्बिट्रेशन अवार्ड को चुनौती देते हुए कहा कि अनुबंध का क्लॉज-23 आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं है।
कमर्शियल कोर्ट ने बोर्ड की दलील स्वीकार कर अवार्ड रद्द कर दिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया। दोनों अदालतों ने माना कि संबंधित क्लॉज केवल विवाद निपटाने की प्रशासनिक व्यवस्था है, आर्बिट्रेशन का प्रावधान नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला उस समय का है जब 2015 का संशोधित आर्बिट्रेशन कानून लागू नहीं हुआ था।
बेंच ने कहा, “जब सेक्शन-11 के तहत आर्बिट्रेटर की नियुक्ति अदालत द्वारा की जाती है, तो अदालत को यह तय करना होता है कि आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट मौजूद और वैध है या नहीं।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियुक्ति आदेश को चुनौती नहीं दी गई और पक्षकार उस पर आगे बढ़ गए, तो बाद में उसकी वैधता पर विवाद उठाना संभव नहीं है।
बेंच ने कहा, “ऐसी स्थिति में आर्बिट्रेटर की नियुक्ति का आदेश ‘रेस ज्यूडीकेटा’ की तरह काम करता है, यानी वही मुद्दा दोबारा नहीं उठाया जा सकता।”
प्रीसिडेंट और रेस ज्यूडीकेटा पर अदालत की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से समझाया कि ‘प्रीसिडेंट’ और ‘रेस ज्यूडीकेटा’ अलग सिद्धांत हैं।
अदालत ने कहा कि प्रीसिडेंट का मतलब किसी फैसले का भविष्य के मामलों में कानून का स्रोत बनना है, जबकि रेस ज्यूडीकेटा उसी पक्षकारों के बीच एक ही विवाद को दोबारा उठाने से रोकता है।
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दूसरे जुड़े मामले में भी समान फैसला
इसी विवाद से जुड़े दूसरे निर्माण अनुबंध मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने समान तर्क अपनाया। उस मामले में भी आर्बिट्रेटर की नियुक्ति पहले ही हाई कोर्ट द्वारा की जा चुकी थी और बाद में क्लॉज-23 की वैधता पर विवाद उठाया गया था।
अदालत ने कहा कि पहले मामले में दिए गए निष्कर्ष इस मामले पर भी पूरी तरह लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट और कमर्शियल कोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि दोनों निचली अदालतों ने क्लॉज-23 की वैधता पर दोबारा विचार कर गलती की।
अदालत ने विवाद से जुड़े मामलों को फिर से कमर्शियल कोर्ट जयपुर भेजते हुए निर्देश दिया कि शेष आपत्तियों पर तीन महीने के भीतर फैसला किया जाए। साथ ही, दोनों पक्षों को अपने-अपने खर्च वहन करने को कहा गया।
Case Title: M/s Eminent Colonizers Pvt. Ltd. vs Rajasthan Housing Board & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 753 & 754 of 2026
Decision Date: 4 February 2026









