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किरायेदार बनाम मकान मालिक विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-बिक्री समझौता 'सेल डीड' नहीं, स्टांप ड्यूटी का सवाल खत्म

वय्याति श्रीनिवासराव बनाम गैनेदी जगज्योति, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किरायेदार से हुआ बिक्री समझौता अपने-आप में सेल डीड नहीं है। स्टांप ड्यूटी पर हाईकोर्ट का आदेश रद्द।

Vivek G.
किरायेदार बनाम मकान मालिक विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-बिक्री समझौता 'सेल डीड' नहीं, स्टांप ड्यूटी का सवाल खत्म

दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की कोर्टरूम नंबर में बुधवार को एक पुराने किरायेदारी विवाद पर अहम फैसला आया। सवाल यह था कि क्या मकान खरीदने का समझौता अपने-आप में “सेल डीड” माना जाएगा और उस पर भारी स्टांप ड्यूटी लगेगी? अदालत ने साफ कहा-नहीं, हर समझौता बिक्री नहीं होता।

यह फैसला आंध्र प्रदेश के एक मामले में आया, जहां किरायेदार और मकान मालिक के बीच दशकों पुराना रिश्ता, बाद में कानूनी लड़ाई में बदल गया।

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मामले की पृष्ठभूमि

मामला आंध्र प्रदेश के राजामहेंद्रवरम इलाके की एक संपत्ति से जुड़ा है।
अपीलकर्ता वय्येटी श्रीनिवासराव पिछले करीब 50 साल से उसी मकान में किरायेदार थे। साल 2009 में मकान मालकिन गैनीडी जगज्योथि ने उनसे संपत्ति बेचने का समझौता किया। तय कीमत थी 9 लाख रुपये, जिसमें से 6.5 लाख एडवांस दे दिए गए।

बाद में विवाद बढ़ा।
मालकिन ने किरायेदार की बेदखली के लिए केस दायर किया और किरायेदार ने समझौते के आधार पर “स्पेसिफिक परफॉर्मेंस” यानी बिक्री पूरी कराने की याचिका दाखिल कर दी।

ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट ने कहा कि यह समझौता असल में “सेल डीड जैसा” है, इसलिए इस पर भारी स्टांप ड्यूटी और पेनल्टी देनी होगी। इसी आदेश को चुनौती देकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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अदालत की अहम टिप्पणी

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अगुवाई वाली पीठ ने पूरे रिकॉर्ड को देखा-समझौते की शर्तें, किरायेदारी का इतिहास और बेदखली का आदेश भी।

कोर्ट ने कहा,
“केवल इस आधार पर कि किरायेदार पहले से मकान में रह रहा था, यह नहीं माना जा सकता कि समझौते के जरिए उसे बिक्री के तहत कब्जा मिला है।”

पीठ ने साफ किया कि-

  • किरायेदार का कब्जा किरायेदारी के कारण था, न कि बिक्री समझौते के कारण।
  • न तो किरायेदारी खत्म हुई थी और न ही ऐसा कोई सबूत था कि समझौते के बाद रिश्ता मालिक-खरीदार में बदल गया।
  • इसलिए यह समझौता “डीम्ड कन्वेयंस” यानी मानी हुई बिक्री नहीं बन सकता।

स्टांप कानून के मुताबिक, अगर किसी “एग्रीमेंट टू सेल” के साथ या उसके आधार पर कब्जा दिया जाता है, तो उसे बिक्री माना जा सकता है।
लेकिन इस केस में कब्जा पहले से ही था-किरायेदार के रूप में, करीब पांच दशक से।

अदालत ने समझाया कि:“अगर कब्जा समझौते से जुड़ा ही नहीं है, तो उस समझौते पर बिक्री जैसा स्टांप ड्यूटी नहीं लग सकती।”

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कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट-दोनों के आदेश रद्द कर दिए।
पीठ ने निर्देश दिया कि:

  • 14 अक्टूबर 2009 का बिक्री समझौता अब सबूत के तौर पर मुकदमे में स्वीकार किया जाएगा।
  • अपीलकर्ता से कोई अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी या पेनल्टी नहीं ली जाएगी।
  • ट्रायल कोर्ट को कहा गया है कि वह इस केस का निपटारा जल्द से जल्द करे।

फैसले के आखिर में अदालत ने कहा, “इस मामले में न तो संपत्ति का ट्रांसफर हुआ है और न ही कानून की नजर में कोई ‘सेल डीड’। इसलिए समझौता केवल समझौता ही रहेगा।”

Case Title: Vayyaeti Srinivasarao vs Gaineedi Jagajyothi

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 21976–21977 of 2023

Decision Date: 15 January 2026

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