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RTE 25% कोटा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: नियम बनाने का आदेश, गरीब बच्चों के दाखिले पर नई दिशा

दिनेश बिवाजी आष्टीकर बनाम महाराष्ट्र राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने RTE कानून के तहत 25% कोटे पर सख्ती दिखाते हुए केंद्र व राज्यों को नियम बनाने का आदेश दिया, ताकि गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिल सके।

Vivek G.
RTE 25% कोटा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: नियम बनाने का आदेश, गरीब बच्चों के दाखिले पर नई दिशा

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act) के तहत निजी स्कूलों में 25% आरक्षण के क्रियान्वयन पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों का दाखिला केवल कागज़ी अधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसी सोच के साथ कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को स्पष्ट नियम बनाने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र के गोंदिया जिले से जुड़े इस मामले में याचिकाकर्ता दिनेश बीवाजी अष्टिकर ने आरोप लगाया कि उनके बच्चों को पड़ोस के निजी स्कूल में 25% कोटे के तहत दाखिला नहीं मिला। आरटीआई से सामने आया कि सीटें खाली थीं, फिर भी स्कूल ने जवाब नहीं दिया। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत नहीं दी कि ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, लेकिन वर्षों की देरी के कारण बच्चों को समय पर राहत मिलना संभव नहीं रहा। इसके बावजूद अदालत ने इसे “नज़ीर तय करने वाला” मामला मानते हुए व्यापक दिशा-निर्देश देने का फैसला किया।

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अदालत की अहम टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी. श्री नरसिंहा की पीठ ने कहा,

“शिक्षा का अधिकार केवल किताबों में दर्ज वादा नहीं है, यह समाज की बराबरी की नींव है।”

कोर्ट ने माना कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया, भाषा की बाधा, डिजिटल अशिक्षा और जानकारी की कमी के कारण गरीब परिवारों के लिए 25% कोटे तक पहुँचना आज भी मुश्किल है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पड़ोस के स्कूलों में दाखिला केवल सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की दिशा में बड़ा कदम है। पीठ ने टिप्पणी की,

“एक ही कक्षा में अमीर और गरीब बच्चों का साथ पढ़ना ही असली सामाजिक बदलाव लाता है।”

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क्या बदलेगा अब?

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की भूमिका को अहम मानते हुए कहा कि अभी जो मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) है, वह पर्याप्त नहीं है। इसे कानूनी ताकत देने के लिए ठोस नियम जरूरी हैं।

अदालत ने निर्देश दिया कि-

  • केंद्र और राज्य सरकारें RTE Act की धारा 38 के तहत स्पष्ट नियम और विनियम बनाएं।
  • इन नियमों में यह तय हो कि 25% कोटे में बच्चों का चयन कैसे होगा, शिकायतें कहाँ और कितने समय में सुनी जाएँगी।
  • NCPCR को इस प्रक्रिया की निगरानी सौंपी गई है।
  • आयोग को 31 मार्च 2026 तक सभी राज्यों से नियमों की स्थिति पर रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

क्यों अहम है यह फैसला

यह फैसला केवल एक परिवार की लड़ाई नहीं, बल्कि देश भर के लाखों बच्चों के अधिकार से जुड़ा है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि यदि नियम नहीं बने, तो शिक्षा का अधिकार “कागज़ी हक” बनकर रह जाएगा।

पीठ ने जोर देकर कहा कि सरकार, स्थानीय प्रशासन और स्कूल-तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा सिर्फ प्रक्रिया की कमी के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।

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अदालत का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे RTE Act की धारा 12(1)(c) के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अनिवार्य नियम और विनियम तुरंत तैयार करें। साथ ही, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को निगरानी की जिम्मेदारी सौंपते हुए अगली सुनवाई की तारीख तय की गई।

Case Title: Dinesh Biwaji Ashtikar vs State of Maharashtra

Case No.: SLP (Civil) No. 10105 of 2017

Case Type: Civil Appeal (RTE Admission Dispute)

Decision Date: 13 January 2026

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