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बार एसोसिएशन अनुच्छेद 12 के अंतर्गत नहीं आते, परमादेश जारी नहीं किया जा सकता: दिल्ली उच्च न्यायालय

संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन और अन्य - दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि बार एसोसिएशन अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' नहीं है, और पटियाला हाउस चैंबर विवाद को लेकर वकील की याचिका खारिज कर दी।

Shivam Y.
बार एसोसिएशन अनुच्छेद 12 के अंतर्गत नहीं आते, परमादेश जारी नहीं किया जा सकता: दिल्ली उच्च न्यायालय

दिल्ली हाईकोर्ट ने पटियाला हाउस कोर्ट स्थित एक वकील के चैंबर को लेकर चले लंबे विवाद पर साफ रुख अपनाते हुए कहा है कि बार एसोसिएशन के खिलाफ इस तरह की रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने अधिवक्ता संगीता राय की अपील खारिज करते हुए सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखा।

यह फैसला 16 जनवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

संगीता राय, जो वर्ष 2000 से अधिवक्ता हैं, ने दावा किया था कि वह पटियाला हाउस कोर्ट के चैंबर नंबर 279A का वर्षों से उपयोग कर रही थीं। उनका कहना था कि चैंबर के मूल आवंटी असगर अली ने उन्हें यह चैंबर किराये पर दिया था।

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याचिका में आरोप लगाया गया कि एक दिन असगर अली और अन्य लोग जबरन चैंबर में घुस आए, ताला तोड़ दिया और उन्हें धमकाकर बाहर निकाल दिया। इसके बाद, न्यू दिल्ली बार एसोसिएशन ने भी चैंबर पर अपना ताला लगा दिया, जिससे उनके जरूरी केस फाइल और दस्तावेज अंदर ही फंसे रह गए।

इस मामले में सिंगल जज ने पहले जिला जज को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को अपना सामान निकालने दिया जाए। बाद में, चैंबर की चाबी मूल आवंटी असगर अली को सौंप दी गई, जिन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि वह चैंबर को किसी को किराये पर नहीं देंगे।

सिंगल जज ने यह भी कहा कि संगीता राय चैंबर की आवंटी नहीं थीं, बल्कि केवल अनुमति के आधार पर वहां बैठ रही थीं। ऐसे में उन्हें चैंबर पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसी आधार पर रिट याचिका को गैर-परिवर्तनीय (not maintainable) मानते हुए खारिज कर दिया गया।

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अपील में संगीता राय ने तर्क दिया कि उन्होंने चैंबर वापस देने वाली मांग (Prayer A) छोड़ दी थी और केवल यह अनुरोध किया था कि बार एसोसिएशन और बार काउंसिल संबंधित वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करें।

उनका कहना था कि सिंगल जज ने इस पहलू पर ठीक से विचार नहीं किया।

अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ असहमत थी। इसने बार एसोसिएशन की प्रकृति की जांच की और पाया कि यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत एक संस्था है, जिसका गठन मुख्य रूप से अपने सदस्यों के कल्याण के लिए किया गया है।

पीठ ने कहा,

“बार एसोसिएशन निजी वकीलों का एक निकाय है,” पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत अपेक्षित सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन नहीं करता है। इसी कारण न्यायालय ने माना कि इसके विरुद्ध कोई परमादेश याचिका जारी नहीं की जा सकती।

अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि किसी वकील द्वारा आपराधिक कृत्य किया गया है, तो उसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उचित कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।

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बार काउंसिल पर अदालत का रुख

अदालत ने माना कि बार काउंसिल ऑफ दिल्ली एक वैधानिक संस्था है, जिसे वकीलों के पेशे को नियंत्रित करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन पीठ ने यह भी कहा कि संगीता राय ने न तो पहले बार काउंसिल से संपर्क किया और न ही उसे याचिका में पक्षकार बनाया।

अदालत ने कहा कि बिना पहले संबंधित प्राधिकरण से गुहार लगाए सीधे रिट याचिका दायर करना उचित नहीं है।

अंतिम फैसला

इन सभी कारणों के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता रहेगी कि वह कानून के अनुसार सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही कर सकती हैं या बार काउंसिल ऑफ दिल्ली से संपर्क कर सकती हैं।

मामले में किसी प्रकार की लागत (cost) नहीं लगाई गई।

Case Title:- Sangita Rai v. New Delhi Bar Association & Others

Case Number:- LPA 368/2024
(Along with CM APPL. 27164/2024 & CM APPL. 49413/2025)

Date of Decision:- 16 January 2026

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