नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम स्थित बहुचर्चित Ambience Lagoon परियोजना से जुड़े लंबे विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें परियोजना को अवैध ठहराते हुए गंभीर टिप्पणियां की गई थीं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने तथ्यों और कानून दोनों की गलत व्याख्या की थी।
यह फैसला राज सिंह गहलोत बनाम अमिताभ सेन एवं अन्य मामले में आया है, जो पिछले दो दशकों से अलग-अलग मंचों पर लंबित था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 1990 के दशक में गुरुग्राम के नाथूपुर इलाके में विकसित Ambience Lagoon Housing Project से जुड़ा है।
डेवलपर कंपनी HLF Enterprises (बाद में Ambience Developers) को वर्ष 1993 में 18.98 एकड़ जमीन पर रिहायशी कॉलोनी विकसित करने का लाइसेंस मिला था। बाद में कंपनी ने उसी जमीन के एक हिस्से (8 एकड़) को डी-लाइसेंस कराकर वहां कमर्शियल कॉम्प्लेक्स विकसित करने की अनुमति ली।
इसी को लेकर फ्लैट मालिकों ने आरोप लगाया कि-
- लेआउट प्लान में बदलाव किया गया
- ओपन एरिया कम किया गया
- बिना वैध अनुमति के कमर्शियल निर्माण हुआ
- पर्यावरण और टाउन प्लानिंग नियमों का उल्लंघन हुआ
इसके बाद मामला हाईकोर्ट, एनजीटी और अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 10 जुलाई 2020 के फैसले में कहा था कि-
- बिल्डर ने शुरू से तथ्यों को छिपाया
- लेआउट प्लान में गड़बड़ी की गई
- अधिकारियों की मिलीभगत से नियमों का उल्लंघन हुआ
- “डीलाइसेंसिंग” की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है
हाईकोर्ट ने यहां तक कहा था कि यह पूरा मामला “सुनियोजित धोखाधड़ी” का प्रतीक है।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि-
“केवल अनुमान और आशंकाओं के आधार पर किसी परियोजना को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।”
अदालत ने कहा कि:
- परियोजना को समय-समय पर वैधानिक मंजूरी मिली थी
- डी-लाइसेंसिंग उस समय लागू नीति के तहत की गई थी
- हाईकोर्ट ने तकनीकी पहलुओं की सही जांच नहीं की
- नागरिक विवादों को पर्यावरण या आपराधिक रंग देना उचित नहीं
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि-
“हर प्रशासनिक त्रुटि को आपराधिक मंशा से जोड़ना न्यायसंगत नहीं है।”
एनजीटी द्वारा लगाए गए भारी पर्यावरणीय मुआवजे और परियोजना गिराने की सिफारिशों पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि-
- मुआवजा तय करने में ठोस आधार नहीं था
- विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट संतुलित नहीं थी
- बिना ठोस नुकसान साबित किए भारी जुर्माना नहीं लगाया जा सकता
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अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने-
- हाईकोर्ट का 10 जुलाई 2020 का फैसला रद्द कर दिया
- बिल्डर के खिलाफ की गई सख्त टिप्पणियां हटाईं
- एनजीटी की कार्रवाई पर पुनर्विचार का संकेत दिया
- मामले को कानून के अनुसार नए सिरे से देखने को कहा
अदालत ने साफ किया कि मामला यहीं समाप्त होता है और आगे कोई दंडात्मक कार्रवाई स्वतः लागू नहीं होगी।
Case Title: Raj Singh Gehlot & Ors. vs Amitabha Sen & Ors.
Case No.: Civil Appeal @ SLP (C) No. 11480 of 2020 (with connected matters)
Decision Date: 20-Jan-2026










