केरल उच्च न्यायालय की फुल बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू पत्नी को अपने पति की अचल संपत्ति से भी भरण-पोषण पाने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि यह अधिकार केवल पति की व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं है, बल्कि उचित परिस्थितियों में उसकी संपत्ति से भी लागू किया जा सकता है। यह फैसला लंबे समय से चले आ रहे कानूनी मतभेदों को सुलझाने वाला माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला तब उठा जब एक व्यक्ति ने पति की संपत्ति का एक हिस्सा खरीदा, जबकि पति-पत्नी के रिश्ते पहले से खराब चल रहे थे। पत्नी ने बाद में फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का दावा किया और संपत्ति को कुर्क करने का आदेश मिला।
खरीदार ने यह कहकर आपत्ति की कि उसने संपत्ति पत्नी के केस दर्ज करने से पहले खरीदी थी, इसलिए उस पर भरण-पोषण का कोई बोझ नहीं डाला जा सकता। जबकि पारिवारिक न्यायालय ने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 39 पर भरोसा करते हुए क्रेता के दावे को खारिज कर दिया, केरल उच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णयों में विरोधाभासी विचारों के कारण डिवीजन बेंच ने मामले को एक आधिकारिक निर्णय के लिए पूर्ण पीठ के पास भेज दिया।
अदालत की टिप्पणी
फुल बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी, न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन और न्यायमूर्ति जी. गिरीश शामिल थे, ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार हिंदू विवाह के साथ ही उत्पन्न होता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार शुरू में “निष्क्रिय” (dormant) अवस्था में रहता है और तभी सक्रिय होता है जब पत्नी को भरण-पोषण से वंचित किया जाता है या वह कानूनी कदम उठाती है।
पीठ ने कहा,
“पत्नी का भरण-पोषण पाने का अधिकार केवल पति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसकी संपत्ति तक विस्तारित हो सकता है।”
अदालत ने यह भी माना कि यदि केवल इस आधार पर खरीदार को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए कि विक्रेता विवाहित था, तो संपत्ति के सौदे असुरक्षित हो जाएंगे। इसलिए खरीदार की जानकारी और परिस्थितियों को देखना जरूरी है।
फुल बेंच ने यह भी देखा कि केरल हाईकोर्ट के पुराने फैसलों में इस मुद्दे पर विरोधाभास था। विजयन बनाम शोभना मामले में पत्नी के संपत्ति से भरण-पोषण के अधिकार को सीमित किया गया था, जबकि बाद के फैसलों में इसके विपरीत रुख अपनाया गया।
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अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विजयन बनाम शोभना में व्यक्त किया गया दृष्टिकोण सही कानून नहीं दर्शाता।
अंतिम फैसला
अंत में फुल बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला कि:
- हिंदू पत्नी को पति की अचल संपत्ति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है, भले ही हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 में इसका स्पष्ट उल्लेख न हो।
- यह अधिकार तब प्रभावी होगा जब पत्नी भरण-पोषण के लिए कानूनी कदम उठाएगी या पति की मृत्यु के कारण वह इससे वंचित हो जाएगी।
- यदि संपत्ति का हस्तांतरण उस समय हुआ हो जब खरीदार को पत्नी के भरण-पोषण के दावे की जानकारी थी, या हस्तांतरण मुफ्त (gratuitous) था, तो पत्नी का अधिकार सुरक्षित रहेगा।
इसी के साथ अदालत ने संदर्भ का उत्तर देते हुए रिकॉर्ड वापस संबंधित डिवीजन बेंच को भेजने का निर्देश दिया।










