नई दिल्ली में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के बहुचर्चित हत्या मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला आदेश बहाल कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल संदेह या अधूरी कड़ियों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2011 का है, जब कर्नाटक के गदग जिले के हुल्कोटी गांव निवासी मार्तंडगौड़ा लापता हो गए थे। उनके बेटे ने 16 दिसंबर 2011 को पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
जांच के दौरान शक की सुई परिवारिक भूमि विवाद की ओर गई। आरोप लगाया गया कि जमीन को लेकर चल रहे विवाद के चलते साजिश रची गई और मार्तंडगौड़ा की हत्या कर दी गई। पुलिस ने इसे हत्या, साजिश और सबूत मिटाने का मामला मानते हुए छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
सेशन कोर्ट ने 2019 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि:
- अभियोजन ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका
- पूरी कहानी परिस्थितिजन्य थी
- कथित प्रत्यक्षदर्शी की गवाही भरोसेमंद नहीं थी
- हत्या की कड़ी पूरी तरह साबित नहीं हो सकी
कोर्ट ने यह भी कहा था कि “सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
इसके बाद राज्य सरकार और शिकायतकर्ता हाईकोर्ट पहुंचे।
28 नवंबर 2023 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए चार आरोपियों को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुना दी।
हाईकोर्ट ने माना कि साजिश, अंतिम बार साथ देखे जाने और बरामदगी जैसे तथ्यों से अपराध साबित होता है।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली) ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा-
“यदि ट्रायल कोर्ट का नजरिया संभव और तर्कसंगत है, तो केवल किसी दूसरे दृष्टिकोण के आधार पर उसे पलटा नहीं जा सकता।”
कोर्ट ने कहा कि:
- कथित चश्मदीद गवाह 21 दिन बाद सामने आया
- उसकी गवाही में गंभीर विरोधाभास थे
- मेडिकल रिपोर्ट घटना के समय से मेल नहीं खाती
- शव की बरामदगी से जुड़ी कड़ी पूरी तरह साबित नहीं हुई
- साजिश का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला
अदालत ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने अपील में हस्तक्षेप करते समय वह सावधानी नहीं बरती, जो कानून अपेक्षित करता है।
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अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला आदेश बहाल कर दिया।
सभी आरोपियों को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया गया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
“जब दो संभावित निष्कर्ष निकलते हों, तो आरोपी के पक्ष वाला दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए,” - सुप्रीम कोर्ट
Case Title: Tulasareddi @ Mudakappa & Ors. vs State of Karnataka
Case No.: Criminal Appeal Nos. 2120–2121 of 2024
Decision Date: 16 January 2026










