सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन क्षेत्र में बने एक रिहायशी प्रोजेक्ट को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने Aarsuday Projects द्वारा बनाई गई इमारत को गिराने का कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया है। साथ ही, ₹10 लाख का मुआवजा और अधिकारियों पर कार्रवाई से जुड़े निर्देश भी निरस्त कर दिए गए हैं। यह फैसला पर्यावरण, विकास और कानून के संतुलन को लेकर अहम माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बीरभूम जिले के बल्लवपुर मौजा स्थित 0.39 एकड़ जमीन से जुड़ा है, जहां Aarsuday Projects ने एक आवासीय भवन का निर्माण किया था।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि यह जमीन “खोआई” क्षेत्र में आती है, जिसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील माना जाता है। उनका कहना था कि निर्माण कार्य सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले सुसांत टैगोर बनाम भारत संघ के निर्देशों का उल्लंघन है।
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2013 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए:
- निर्माण को अवैध घोषित किया
- इमारत गिराने का आदेश दिया
- ₹10 लाख का जुर्माना लगाया
- और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए
इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कई अहम बातें कहीं।
पीठ ने कहा कि:
“सिर्फ यह कहना कि भूमि ‘खोआई’ प्रकृति की है, पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस राजस्व रिकॉर्ड और वैज्ञानिक आधार आवश्यक हैं।”
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि-
- जमीन राजस्व रिकॉर्ड में ‘डांगा’ (बंजर भूमि) दर्ज थी
- क्षेत्र पहले से आवासीय ज़ोन में शामिल था
- निर्माण से पहले स्थानीय निकायों से अनुमति ली गई थी
- पर्यावरण बोर्ड की रिपोर्ट में भी यह नहीं कहा गया था कि निर्माण अवैध है
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी निर्माण को अवैध घोषित करने से पहले यह देखना जरूरी है कि अनुमतियां उस समय के नियमों के अनुसार ली गई थीं या नहीं।
हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल
शीर्ष अदालत ने माना कि हाईकोर्ट ने:
- तथ्यों की गहराई से जांच नहीं की
- प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया
- और बिना ठोस आधार के तोड़फोड़ जैसा कठोर आदेश दे दिया
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कोर्ट ने यह भी कहा कि:
“कानून के तहत दी गई अनुमति को बाद में बदलती व्याख्या के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
- हाईकोर्ट का तोड़फोड़ आदेश रद्द
- ₹10 लाख मुआवजा देने का निर्देश निरस्त
- अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश खत्म
- Aarsuday Projects को राहत
- निर्माण को वैध माना गया
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन किसी परियोजना को बिना ठोस आधार के अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल पर्यावरणीय आशंकाओं के आधार पर किसी निर्माण को गिराना उचित नहीं है, जब तक कि कानून का स्पष्ट उल्लंघन साबित न हो। अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए विकास और संरक्षण-दोनों को समान महत्व दिया।
Case Title: M/s Aarsuday Projects & Infrastructure Pvt. Ltd. vs Jogen Chowdhury & Ors.
Case No.: Civil Appeal No. 2920 of 2018
Decision Date: 29 January 2026










