दिल्ली हाईकोर्ट ने कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित एक बहुमूल्य संपत्ति के पारिवारिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि महिला के अधिकारों से जुड़े मामलों में प्रारंभिक स्तर पर मुकदमे को खारिज करना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि यह तय करना कि महिला का अधिकार सीमित है या पूर्ण यह साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल में तय होगा, न कि शुरुआती चरण में।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला संपत्ति संख्या 6, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली से जुड़ा है। यह संपत्ति मूल रूप से स्वर्गीय आर.बी. सरदार बिशन सिंह की थी। वर्ष 1956 में उन्होंने एक गिफ्ट डीड के जरिए यह संपत्ति अपने दो जीवित बेटों और अपने दिवंगत बेटे की नाबालिग बेटी वादी महिला के नाम की।
गिफ्ट डीड में जहां बेटों को पूर्ण स्वामित्व दिया गया, वहीं पोती को केवल आजीवन अधिकार (लाइफ एस्टेट) दिया गया। बाद में, वादी ने दावा किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के चलते उनका यह सीमित अधिकार स्वतः पूर्ण स्वामित्व में बदल गया है, और उन्होंने संपत्ति के बंटवारे की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
प्रतिवादी पक्ष ने ऑर्डर 7 रूल 11 CPC के तहत याचिका दाखिल कर यह कहते हुए वाद खारिज करने की मांग की कि महिला को केवल जीवनभर उपयोग का अधिकार था, स्वामित्व नहीं।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने हिंदू कानून के शास्त्रीय सिद्धांतों और आधुनिक कानून के बीच संतुलन पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को संपत्ति पहले से मौजूद भरण-पोषण के अधिकार के बदले दी गई हो, तो धारा 14(1) लागू होगी और संपत्ति पूर्ण स्वामित्व में बदल जाएगी।
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न्यायालय ने टिप्पणी की:
“नाबालिग, अविवाहित पोती, जिसके पिता का देहांत हो चुका हो, उसके भरण-पोषण की नैतिक जिम्मेदारी परिवार पर होती है। ऐसे नैतिक दायित्व कुछ परिस्थितियों में कानूनी अधिकार का रूप ले सकते हैं।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गिफ्ट डीड में “भरण-पोषण के बदले” शब्दों का न होना, इस स्तर पर मुकदमा खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। यह प्रश्न कि गिफ्ट किस उद्देश्य से दिया गया था साक्ष्य के बाद तय किया जाएगा।
प्रतिवादियों ने यह भी तर्क दिया कि वाद समय-सीमा से बाहर है। इस पर कोर्ट ने कहा कि वादी के अधिकार को पहली बार 2024 में चुनौती दी गई, इसलिए उसी समय कारण-कार्य (cause of action) उत्पन्न हुआ। केवल इस आधार पर कि कानून 1956 में लागू हुआ था, मुकदमे को समय-सीमा से बाहर नहीं माना जा सकता।
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अदालत का अंतिम निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रतिवादी की याचिका खारिज कर दी और कहा कि:
- वाद में कारण-कार्य मौजूद है
- मुकदमा कानूनन प्रतिबंधित नहीं है
- महिला के अधिकारों का अंतिम निर्धारण ट्रायल के बाद होगा
हालांकि, अदालत ने वादी को निर्देश दिया कि वह स्वामित्व की घोषणा (declaration) से संबंधित आवश्यक कोर्ट फीस अलग से जमा करे।
इसके साथ ही, कोर्ट ने साफ किया कि यह टिप्पणियां केवल प्रारंभिक याचिका के निपटारे तक सीमित हैं और ट्रायल के अंतिम परिणाम को प्रभावित नहीं करेंगी।
Case Title: Mrs. Ajit Inder Singh v. Simranjit Singh Grewal & Ors.
Case Number: CS(OS) 1022/2024
Date of Judgment: 30 January 2026










