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आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद हत्या के मामले को दोबारा खोलने के निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया।

सीलम नागामुनि नायडू और अन्य। बनाम आंध्र प्रदेश राज्य - आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि हत्या मामले में सच्चाई सामने लाने के लिए फैसला सुरक्षित होने के बाद भी ट्रायल दोबारा खोला जा सकता है।

Shivam Y.
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद हत्या के मामले को दोबारा खोलने के निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया।

अमरावती में शुक्रवार को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की विशेष पीठ में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर था। अदालत के सामने सवाल सीधा था क्या ट्रायल कोर्ट फैसला सुरक्षित रखने के बाद भी मामले को दोबारा खोल सकता है? हत्या के एक पुराने केस में यही मुद्दा हाईकोर्ट के सामने आया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2018 का है। अनामय्या ज़िले के गालीवेड़ु मंडल में खेत की रखवाली के दौरान हुए झगड़े में श्रीनिवासुलु नायडू पर लाठियों से हमला हुआ। गंभीर रूप से घायल श्रीनिवासुलु को पहले रायचोटी सरकारी अस्पताल, फिर तिरुपति और अंत में वेल्लोर ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

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पुलिस ने शुरुआत में केस हत्या के प्रयास का दर्ज किया था, लेकिन मौत के बाद आरोप हत्या में बदल दिए गए। ट्रायल पूरा हुआ, बहसें खत्म हो चुकी थीं और 14 नवंबर 2024 को मामला फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया गया।

इसके बाद ट्रायल जज ने 26 नवंबर 2024 को अचानक आदेश देकर केस दोबारा खोल दिया। कारण था अस्पताल की अहम रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड और डॉक्टर की गवाही रिकॉर्ड पर न होना।

अदालत की टिप्पणियां

आरोपियों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि फैसला सुरक्षित होने के बाद केस खोलना निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका कहना था कि अभियोजन को कमियां भरने का दूसरा मौका दिया जा रहा है।

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लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड देखते हुए कुछ अहम बातें नोट कीं। गवाहों के बयान इस बात पर एकमत नहीं थे कि मृतक की मौत किस अस्पताल में हुई। कहीं सीएमसी वेल्लोर का ज़िक्र था, तो कहीं सरकारी मेडिकल कॉलेज का। मेडिकल रिकॉर्ड और इलाज की पूरी कड़ी अदालत के सामने साफ नहीं थी।

न्यायमूर्ति डॉ. जस्टिस वेंकट ज्योतिर्मयी प्रतापा ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की,

“हर आपराधिक मुकदमा सच्चाई की खोज की यात्रा है। अदालत मूक दर्शक नहीं बन सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि कानून अदालत को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी स्तर पर जरूरी गवाह या सबूत बुला सके, अगर उससे न्यायपूर्ण फैसला हो सके।

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में मेडिकल साक्ष्य बेहद अहम होते हैं। अगर चोटों और मौत के बीच सीधा संबंध साफ नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट का यह दायित्व है कि वह रिकॉर्ड पूरा करे।

अदालत ने माना कि ट्रायल जज ने कानून के तहत विवेकपूर्ण तरीके से अधिकार का इस्तेमाल किया। इससे न तो अभियोजन को अनुचित लाभ मिला और न ही आरोपियों को कोई वास्तविक नुकसान हुआ, क्योंकि दोनों पक्षों को जिरह का पूरा मौका मिलेगा।

अंत में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। साथ ही, पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए गए कि हत्या के मामलों में अस्पताल रिकॉर्ड, मेडिकल राय और इलाज की पूरी कड़ी समय पर और सही तरीके से अदालत में पेश की जाए।

Case Title: Seelam Nagamuni Naidu & Ors. vs State of Andhra Pradesh

Case Number: Criminal Petition No. 8982 of 2024

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