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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की अनुमति बिना पुलिस नहीं कर सकती ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’, आदेश रद्द

प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत की अनुमति के बिना पुलिस आगे जांच नहीं कर सकती। यूपी के चर्चित मामले में हाईकोर्ट का आदेश रद्द।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की अनुमति बिना पुलिस नहीं कर सकती ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’, आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पुलिस या जांच एजेंसी किसी मामले में अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने और उसे अदालत द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद बिना अदालत की अनुमति के आगे की जांच नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसा करना कानून की प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में दर्ज एक सामूहिक दुष्कर्म और अन्य आरोपों से जुड़ा है। वर्ष 2013 में दर्ज एफआईआर में कई आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की गंभीर धाराएं लगाई गई थीं।

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जांच के दौरान मामला कई बार अलग-अलग जांच एजेंसियों को सौंपा गया। अंततः वर्ष 2014 में जांच अधिकारी ने फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास हैं और उपलब्ध सबूत आरोपों की पुष्टि नहीं करते।

इसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता को कई बार नोटिस भेजे, लेकिन उसके उपस्थित न होने और कोई आपत्ति दर्ज न करने के कारण वर्ष 2015 में क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली गई। अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद मेडिकल और अन्य साक्ष्यों को भी आरोपों के समर्थन में पर्याप्त नहीं पाया।

एनएचआरसी की दखल और दोबारा जांच का आदेश

करीब तीन साल बाद मामले में नया मोड़ आया जब एक व्यक्ति ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कर जांच में कथित खामियों की बात उठाई। आयोग ने पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने और पीड़िता तथा अन्य को मुआवजा देने के निर्देश दिए।

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इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी और आगे की जांच (फर्दर इन्वेस्टिगेशन) की सिफारिश की गई। इसी क्रम में वर्ष 2021 में पुलिस अधिकारियों ने आगे जांच के निर्देश जारी किए और आरोपियों के डीएनए सैंपल भी लिए गए।

हाईकोर्ट में चुनौती

आरोपियों ने इन आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी से अंतरिम राहत देते हुए जांच जारी रखने की अनुमति दी और याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस या जांच एजेंसी अदालत से अनुमति लिए बिना फाइनल रिपोर्ट दाखिल होने के बाद आगे की जांच कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि कानून के तहत आगे की जांच का अधिकार मौजूद है, लेकिन यह पूरी तरह न्यायालय की निगरानी में होना चाहिए।

पीठ ने कहा, “यदि जांच एजेंसी को लगता है कि किसी मामले में आगे जांच जरूरी है, तो उसके लिए अदालत से अनुमति लेना अनिवार्य प्रक्रिया है।”

अदालत ने यह भी कहा कि समय के साथ एक स्थापित कानूनी प्रथा विकसित हुई है, जिसके अनुसार आगे की जांच शुरू करने से पहले अदालत की अनुमति ली जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय ही आगे जांच का आदेश दे सकते हैं, पुलिस अधिकारी स्वयं ऐसा आदेश जारी नहीं कर सकते।

पीठ ने पुलिस अधीक्षक द्वारा बिना अनुमति जांच के निर्देश देने को “कानूनी प्रक्रिया के विपरीत” बताया और कहा कि यह अदालत की अधिकारिता को कमजोर करता है।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष डीएनए जांच रिपोर्ट भी रखी गई, जिसमें कहा गया कि आरोपी कथित गर्भ के जैविक पिता नहीं हैं। हालांकि अदालत ने मामले के तथ्यों पर विस्तार से टिप्पणी करने से परहेज किया और केवल प्रक्रिया संबंधी मुद्दे पर फैसला दिया।

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सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस अधिकारियों द्वारा जारी 2019 और 2021 के आदेशों को भी अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि इस फैसले का प्रभाव लंबित आपराधिक पुनरीक्षण याचिका या अन्य कार्यवाही पर नहीं पड़ेगा और ट्रायल कोर्ट को मामले का निर्णय अपने गुण-दोष के आधार पर करना होगा।

Case Title: Pramod Kumar & Ors. vs State of U.P. & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (Criminal) No. 350 of 2024

Decision Date: 04 January 2026

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