कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम आपराधिक अपील में निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल संदेह और भावनात्मक आरोपों के आधार पर किसी को आत्महत्या के लिए उककसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह मामला पश्चिम बंगाल के नकाशीपाड़ा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जिसमें एक युवक की मौत के बाद कई लोगों को दोषी ठहराया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, अप्रैल 2010 की रात मृतक युवक को कथित रूप से चोरी के आरोपों को लेकर गांव के कुछ लोग घर से बाहर ले गए थे। आरोप था कि युवक ने मोबाइल फोन और पैसे चुराए थे। परिवार का कहना था कि आरोपियों ने युवक को धमकाया, पैसे छीने और अपमानित किया। अगली सुबह युवक का शव घर से कुछ दूरी पर एक पेड़ से लटका मिला।
इस घटना के बाद पुलिस ने पहले हत्या का मामला दर्ज किया, लेकिन जांच के बाद आरोप आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306/34) में बदले गए। 2012 में सेशन कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मृतक मानसिक रूप से कमजोर था और पहले भी उस पर चोरी के आरोप लगते रहे थे। ऐसे में परिवार और गांव वालों की डांट-फटकार से वह मानसिक दबाव में था। वकील ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपी द्वारा आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर उकसाने का कोई ठोस सबूत नहीं है।
वहीं राज्य की ओर से कहा गया कि आरोपियों की धमकी और दबाव के कारण ही युवक ने आत्महत्या की।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति चैटाली चटर्जी दास ने गवाही और दस्तावेजों की विस्तार से जांच की। कोर्ट ने पाया कि:
- परिवार के सदस्यों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं।
- किसी पड़ोसी या स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया गया।
- पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में किसी तरह की मारपीट या बाहरी चोट के निशान नहीं मिले।
- आत्महत्या से पहले आरोपियों द्वारा “उकसाने” का कोई स्पष्ट और सीधा कृत्य साबित नहीं हुआ।
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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा,
“आत्महत्या के लिए उकसावे में एक स्पष्ट मानसिक इरादा और सक्रिय भूमिका जरूरी होती है। बिना ठोस सबूत के दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती।”
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा है, सभी आरोपियों को बरी कर दिया। निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया गया और अपील स्वीकार कर ली गई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी तुरंत अपने-अपने जमानत बंधनों से मुक्त किए जाएं।
Case Title: Pabitra Roy & Ors. vs State of West Bengal
Case No.: CRA 696 of 2012
Decision Date: 03 February 2026










