मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को बेटे की कस्टडी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा

लक्ष्मीकांत जोशी बनाम लोकेश्वरी @ परमेश्वरी और अन्य - छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को बच्चे की हिरासत देने से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें वित्तीय स्थिति के बजाय बच्चे के कल्याण पर जोर दिया गया।

Shivam Y.
दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को बेटे की कस्टडी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटे की अभिरक्षा (कस्टडी) को लेकर चल रहे एक पारिवारिक विवाद में साफ कहा है कि बच्चे के भविष्य और भलाई के सामने माता-पिता के अधिकार गौण हैं। कोर्ट ने उस पिता की अपील खारिज कर दी, जो बेटे की कस्टडी चाहता था, लेकिन बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रह रहा था। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में बच्चे का हित मां के साथ रहने में ही सुरक्षित है

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बेमेतरा जिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत जोशी और उनकी पत्नी लोकेश्वरी उर्फ परमेश्वरी का विवाह वर्ष 2013 में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। दंपति के दो बेटे हैं यश और आयुष।

शादी के कुछ वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया। पति का आरोप था कि पत्नी ने उन्हें दहेज के झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी। वहीं पत्नी का कहना था कि पति ने बिना तलाक लिए दूसरी महिला, सुमन जोशी उर्फ लिलेश्वरी, को घर में पत्नी की तरह रख लिया है।

Read also:- शादी के वादे पर बने यौन संबंध को हर हाल में बलात्कार नहीं कहा जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

विवाद के बीच छोटे बेटे आयुष के साथ पत्नी मायके चली गई, जबकि बड़ा बेटा यश कुछ समय पिता के साथ रहा। बाद में महिला थाने और सखी वन स्टॉप सेंटर के हस्तक्षेप के बाद यश को मां के सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद पिता ने हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत फैमिली कोर्ट में कस्टडी के लिए आवेदन किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।

पिता की दलील

पिता की ओर से दलील दी गई कि वह आर्थिक रूप से सक्षम हैं और बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकते हैं। वकील ने कहा कि मां के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है, इसलिए बच्चे का भविष्य पिता के साथ सुरक्षित रहेगा।

मां का पक्ष

मां ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पति खुद स्वीकार कर चुके हैं कि वह दूसरी महिला के साथ रह रहे हैं और मंदिर में उससे शादी करने की बात भी कही है। ऐसे माहौल में बच्चे को रखना उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए ठीक नहीं होगा।

Read also:- हेलिकॉप्टर रिपोर्ट पर दर्ज FIR पर ब्रेक: पत्रकारों को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से अंतरिम राहत

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि कानून भले ही पिता को प्राकृतिक संरक्षक मानता हो, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है।

पीठ ने कहा,

“कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन माता या पिता है, बल्कि यह है कि बच्चे का सर्वांगीण कल्याण कहां सुरक्षित है।”

Read also:- साकेत कोर्ट कर्मचारी की आत्महत्या पर दिल्ली हाईकोर्ट गंभीर, स्टाफ की कमी और कार्यभार के ऑडिट का आदेश

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक क्षमता के आधार पर कस्टडी तय नहीं की जा सकती। बच्चे का नैतिक, भावनात्मक और मानसिक वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अदालत ने पिता द्वारा दूसरी महिला के साथ रहने को एक गंभीर तथ्य माना। बेंच ने कहा कि ऐसेहालात में बच्चे को सौतेली मां के साथ समायोजन के लिए मजबूर करना उसके हित में नहीं होगा।

फैमिली कोर्ट के फैसले पर मुहर

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस टिप्पणी से सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रहना पति का अनुचित आचरण है और यह बच्चे के हित के खिलाफ जाता है।

Read also:- 65 दिन की शादी, 14 साल की लड़ाई: सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया नेहा-अभिषेक का वैवाहिक रिश्ता

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि “बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है, न कि माता-पिता के कानूनी अधिकार।”

अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पिता की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में नाबालिग बेटे की कस्टडी मां के पास ही रहना उसके लिए बेहतर है।

इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट का फैसला सही और कानूनी रूप से उचित है।

Case Title: Laxmikant Joshi v. Lokeshwari @ Parmeshwari & Anr.

Case Number: First Appeal (MAT) No. 87 of 2022

Date of Judgment: 14 January 2026

Mobile App

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Install App
CourtBook Mobile App

More Stories