सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद पर विराम लगाते हुए नेहा लाल और अभिषेक कुमार की शादी को समाप्त कर दिया है। यह मामला सिर्फ तलाक का नहीं था, बल्कि बीते 14 वर्षों में दर्ज दर्जनों मुकदमों, आपसी आरोपों और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की एक मिसाल बन चुका था। कोर्ट ने इसे “असाध्य रूप से टूट चुका विवाह” मानते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तलाक की अनुमति दी।
मामले की पृष्ठभूमि
नेहा लाल और अभिषेक कुमार की शादी 28 जनवरी 2012 को हुई थी। लेकिन महज 65 दिनों के भीतर दोनों अलग हो गए। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच मुकदमों की एक लंबी श्रृंखला शुरू हो गई।
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रिकॉर्ड के मुताबिक:
- पति-पत्नी ने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से ज्यादा केस दायर किए
- इनमें घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, आपराधिक शिकायतें, पुनरीक्षण याचिकाएं और ट्रांसफर पिटिशन शामिल थीं
- मामले दिल्ली, गाजियाबाद, लखनऊ और इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचे
कोर्ट के अनुसार, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ लगातार मुकदमे दायर किए, जिससे न्यायिक व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ पड़ा।
अदालत की सुनवाई और दलीलें
पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि:
- शादी को अनुच्छेद 142 के तहत खत्म किया जाए
- सभी लंबित मामलों को समाप्त किया जाए
उनका तर्क था कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और अब साथ रहने की कोई संभावना नहीं है।
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वहीं पति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि:
- पत्नी ने झूठे केस दर्ज कराए
- कई मामलों में अदालत ने उन्हें राहत दी
- तलाक की मांग सिर्फ चल रहे मामलों से बचने के लिए की गई है
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विस्तृत रिकॉर्ड और हाईकोर्ट से प्राप्त सत्यापित जानकारी का अध्ययन किया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“जब पति-पत्नी एक दशक से अधिक समय से अलग रह रहे हों, और सुलह की सभी कोशिशें विफल हो चुकी हों, तो ऐसे रिश्ते को कानूनी रूप से जीवित रखना केवल पीड़ा बढ़ाता है।”
कोर्ट ने कहा कि-
- विवाह केवल कानूनी बंधन नहीं, बल्कि भावनात्मक रिश्ता होता है
- जब संबंध पूरी तरह टूट जाएं, तो उन्हें जबरन ढोया नहीं जा सकता
- बार-बार मुकदमे करना न्याय का दुरुपयोग है
पीठ ने यह भी दोहराया कि अनुच्छेद 142 का उद्देश्य “पूर्ण न्याय” करना है, भले ही एक पक्ष तलाक के लिए सहमत न हो।
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फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में:
- विवाह को असाध्य रूप से टूटा हुआ मानते हुए तलाक मंजूर किया
- दोनों पक्षों के बीच चल रहे अधिकांश मामलों को समाप्त किया
- केवल झूठे हलफनामे और न्यायालय को गुमराह करने से जुड़े मामलों को जारी रखने का आदेश दिया
- किसी भी पक्ष को गुजारा भत्ता नहीं देने का निर्देश
- दोनों पक्षों पर ₹10,000–₹10,000 का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“अब दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया मुकदमा दाखिल नहीं करेंगे।”
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निष्कर्ष
यह फैसला उन मामलों के लिए एक अहम मिसाल है, जहां विवाह केवल कानूनी रूप से जीवित रह जाता है लेकिन भावनात्मक रूप से समाप्त हो चुका होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कानून का उद्देश्य बदले की लड़ाई नहीं, बल्कि न्याय और शांति सुनिश्चित करना है।
Case Title: Neha Lal vs Abhishek Kumar
Case No.: Transfer Petition (Crl.) No. 338 of 2025
Decision Date: 20 January 2026










