देश में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) की भूमिका पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने साफ कहा कि किसी भी छात्र की आत्महत्या या अस्वाभाविक मृत्यु की सूचना मिलते ही संस्थान का कानूनी और नैतिक दायित्व है कि वह तुरंत पुलिस को जानकारी दे और FIR दर्ज कराए। यह आदेश 15 जनवरी 2026 को पारित किया गया
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अमित कुमार एवं अन्य बनाम भारत संघ से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट पहले ही 24 मार्च 2025 को FIR के अनिवार्य पंजीकरण को लेकर कानून स्पष्ट कर चुका था। उसी क्रम में कोर्ट ने देशभर में शैक्षणिक परिसरों में हो रही छात्र आत्महत्याओं के पीछे के कारणों को समझने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यबल (National Task Force – NTF) का गठन किया था।
पीठ ने कहा कि छात्र आत्महत्या केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि यह संस्थागत कमियों, सामाजिक दबावों और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी का संकेत भी हो सकती है।
कोर्ट की टिप्पणियां
अंतरिम रिपोर्ट पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि 15–29 आयु वर्ग में आत्महत्या, विशेषकर छात्रों के बीच, एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। पीठ ने टिप्पणी की,
“उच्च शिक्षण संस्थान यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि छात्र की निजी जिंदगी अलग है। सुरक्षित, समावेशी और सहायक वातावरण बनाना उनकी मूल जिम्मेदारी है।”
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कई संस्थानों में समान अवसर प्रकोष्ठ (EOC), आंतरिक शिकायत समिति (ICC) और एंटी-रैगिंग तंत्र केवल कागजों तक सीमित हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, छात्रवृत्तियों में देरी और अत्यधिक अकादमिक दबाव को भी छात्रों के मानसिक संकट का बड़ा कारण बताया गया।
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राष्ट्रीय कार्यबल की प्रमुख खोजें
NTF की रिपोर्ट के अनुसार:
- 2022 में देश में लगभग 13,000 छात्र आत्महत्याएं दर्ज की गईं।
- 65% से अधिक संस्थानों में कोई मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर उपलब्ध नहीं है।
- 73% संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं हैं।
- छात्रवृत्ति में देरी और आर्थिक तनाव छात्रों की परेशानी को और बढ़ा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट ने कई अहम निर्देश जारी किए, जिनमें प्रमुख हैं:
- किसी भी छात्र की आत्महत्या या अस्वाभाविक मृत्यु की सूचना मिलते ही पुलिस को रिपोर्ट करना अनिवार्य।
- हर साल छात्र आत्महत्याओं का विवरण UGC और संबंधित नियामक संस्थाओं को देना होगा।
- छात्रवृत्ति की लंबित राशि चार महीने के भीतर जारी करनी होगी।
- छात्रवृत्ति में देरी के कारण किसी छात्र को परीक्षा से रोकना, हॉस्टल से निकालना या डिग्री रोकना अवैध माना जाएगा।
- सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में एंटी-रैगिंग कमेटी, ICC और छात्र शिकायत निवारण तंत्र का सख्ती से पालन।
- खाली पड़े शिक्षण और प्रशासनिक पद चार महीने में भरने के निर्देश।
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न्यायालय का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वे इन निर्देशों को देशभर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों तक तुरंत पहुंचाएं और अनुपालन सुनिश्चित करें। साथ ही, राष्ट्रीय कार्यबल से कहा गया है कि वह अंतिम रिपोर्ट में एक समग्र छात्र कल्याण और आत्महत्या रोकथाम ढांचा तैयार करे, ताकि ये निर्देश केवल कागजों तक सीमित न रहें।
Case Title: Amit Kumar & Ors. v. Union of India & Ors.
Case Number: Criminal Appeal No. 1425 of 2025
Date of Order: January 15, 2026










