दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि एक ही लेनदेन पर बार-बार टैक्स जांच शुरू करना कानूनन गलत है। अदालत ने पत्रकार राधिका रॉय और डॉ. प्रणय रॉय को जारी किए गए आयकर पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) नोटिस को रद्द कर दिया। यह मामला आकलन वर्ष 2009-10 से जुड़ा है और करीब एक दशक से लंबित था
मामले की पृष्ठभूमि
राधिका रॉय और प्रणय रॉय, दोनों RRPR होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और शेयरधारक थे। वर्ष 2009-10 के लिए राधिका रॉय ने अपनी आय का विवरण दाखिल किया, जिसे शुरू में स्वीकार कर लिया गया।
इसके बाद 2011 में आयकर विभाग ने NDTV के शेयर लेनदेन से जुड़े मुद्दे पर पुनर्मूल्यांकन शुरू किया। इस प्रक्रिया के दौरान विभाग ने RRPR से मिले ब्याज-मुक्त (interest-free) ऋण को “डीम्ड डिविडेंड” मानकर जोड़ने पर भी विचार किया, लेकिन विस्तृत जांच के बाद 30 मार्च 2013 को पारित आदेश में कोई अतिरिक्त कर नहीं जोड़ा गया।
तीन साल बाद, 31 मार्च 2016 को विभाग ने फिर से उसी आकलन वर्ष के लिए नया नोटिस जारी कर दिया। इस बार आरोप था कि ब्याज-मुक्त ऋण से राधिका रॉय को “डीम्ड इनकम” का लाभ मिला है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
राधिका और प्रणय रॉय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यह नया नोटिस केवल “मत परिवर्तन” (change of opinion) पर आधारित है।
उन्होंने अदालत को बताया कि पहले ही सभी दस्तावेज, बैलेंस शीट और खातों की जांच हो चुकी थी। उसी लेनदेन को अलग कानूनी धारा के तहत दोबारा खोलना अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
उनका कहना था कि आयकर विभाग एक ही तथ्य को बार-बार नए कोण से देखने के बहाने करदाताओं को परेशान नहीं कर सकता।
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आयकर विभाग का पक्ष
विभाग ने तर्क दिया कि इस बार मामला अलग है क्योंकि RRPR ने ICICI बैंक से भारी ब्याज पर ऋण लिया और उसी धन से निदेशकों को ब्याज-मुक्त ऋण दिया गया।
विभाग के अनुसार, पहले यह मुद्दा “डीम्ड डिविडेंड” के रूप में देखा गया था, जबकि अब इसे “डीम्ड इनकम” माना जा रहा है। इसलिए नया नोटिस वैध है।
कोर्ट का अवलोकन
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की पीठ ने विभाग की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“जिस लेनदेन की पूरी जांच पहले ही हो चुकी हो और उस पर कोई जोड़ न किया गया हो, उसे दोबारा खोलना कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”
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पीठ ने यह भी कहा कि शिकायत या फाइल ट्रांसफर को “नई जानकारी” नहीं माना जा सकता, जब सभी तथ्य पहले से ही आकलन अधिकारी के सामने मौजूद थे।
कोर्ट ने माना कि करदाता का दायित्व केवल प्राथमिक तथ्य बताने का होता है। उससे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह विभाग को संभावित कानूनी व्याख्याएं भी बताए।
सीमाबद्धता और अधिकार क्षेत्र का सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि विभाग ने छह साल की विस्तारित समय सीमा का गलत इस्तेमाल किया।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि राधिका रॉय ने सभी आवश्यक तथ्य पहले ही उजागर कर दिए थे। ऐसे में “तथ्य छिपाने” का आरोप टिकता नहीं है।
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पीठ ने टिप्पणी की,
“बार-बार पुनर्मूल्यांकन करदाता को अनावश्यक उत्पीड़न में डालता है और कर प्रणाली में अनिश्चितता पैदा करता है।”
अदालत का अंतिम निर्णय
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मार्च 2016 को जारी दोनों पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द कर दिए।
अदालत ने कहा कि यह कार्यवाही न केवल अधिकार क्षेत्र से बाहर थी, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन भी करती है।
कोर्ट ने आयकर विभाग पर प्रतीकात्मक रूप से प्रत्येक याचिकाकर्ता को ₹1 लाख लागत देने का भी आदेश दिया और मामले को यहीं समाप्त कर दिया।










