सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक अहम सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और कई राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की ओर से अदालत के आदेशों के पालन में ढिलाई का मुद्दा खुलकर सामने आया। मामला Ayesha Jain बनाम Amity University, Noida & Others से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट पहले ही केंद्र, UGC और सभी राज्यों/UTs से तय जानकारी लेकर व्यक्तिगत रूप से शपथपत्र (affidavit) दाखिल करने को कह चुका है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला W.P.(Civil) No.531/2025 के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने चल रहा है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने साफ निर्देश दिया था कि
- भारत सरकार की तरफ से कैबिनेट सेक्रेटरी,
- राज्यों/UTs की तरफ से चीफ सेक्रेटरी, और
- UGC की तरफ से चेयरमैन
खुद व्यक्तिगत रूप से एफिडेविट दाखिल करेंगे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि इसमें किसी तरह का डेलीगेशन (delegation) यानी किसी और अधिकारी से फाइलिंग स्वीकार नहीं होगी।
अदालत का अवलोकन
सुनवाई शुरू होते ही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि वे Union of India (UoI) और UGC की तरफ से पेश हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ने अपने-अपने एफिडेविट दाखिल किए हैं, लेकिन UoI का एफिडेविट कैबिनेट सेक्रेटरी द्वारा नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा विभाग के सचिव द्वारा फाइल हुआ है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। बेंच ने कहा कि वह “काफी हैरान” है कि जब 20 नवंबर 2025 के आदेश में साफ कहा गया था कि कैबिनेट सेक्रेटरी को खुद शपथपत्र देना है, तो फिर आदेश की अनदेखी कैसे हुई।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पिछली आदेश की भाषा बिल्कुल स्पष्ट थी-
“अफिडेविट व्यक्तिगत रूप से उन्हीं द्वारा पुष्टि किया जाएगा, कोई डेलीगेशन नहीं होगा।”
बेंच ने तीखे शब्दों में कहा कि अगर कैबिनेट सेक्रेटरी को कोई “तकनीकी” दिक्कत थी, तो वे खुद अदालत के सामने आवेदन देकर छूट मांग सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
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कोर्ट में केंद्र का रुख
सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि UoI के एफिडेविट में छूट (exemption) की मांग की गई थी। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सचिव द्वारा दाखिल एफिडेविट में ऐसी छूट मांगना उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि आदेश सीधे कैबिनेट सेक्रेटरी के लिए था।
कोर्ट की पूछताछ पर सॉलिसिटर जनरल ने स्वीकार किया कि समय पर आवेदन न आ पाने के पीछे संभवतः “गलतफहमी” या “अनजाने में हुई चूक” रही।
इसके बाद कोर्ट ने फिलहाल इस मुद्दे पर आगे कठोर टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि वह अभी इस पर “और कुछ नहीं” कह रहा है, लेकिन केंद्र को मौका दिया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि:
- कैबिनेट सेक्रेटरी अब एक उचित आवेदन/एफिडेविट दाखिल कर सकते हैं, जिसमें वे छूट या व्यवस्था स्पष्ट कर सकें।
- Union of India को अनुमति दी गई कि वह मामले पर “दोबारा विचार” करके जरूरी कदम उठाए।
- केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि संबंधित मंत्रालय/विभागों के सचिव व्यक्तिगत रूप से पुष्टि किए गए नए/अतिरिक्त एफिडेविट दो हफ्ते के भीतर दाखिल करें।
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राज्य और केंद्रशासित प्रदेश
कोर्ट ने पिछली आदेश के पालन के आधार पर राज्यों/UTs को तीन श्रेणियों में बांटा:
(i) जिन राज्यों ने आदेश का पालन कर एफिडेविट दाखिल कर दिया
असम, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड, मणिपुर, मेघालय, पंजाब, नागालैंड, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम।
इन राज्यों को कोर्ट ने कहा कि अगर वे कोई और अतिरिक्त जानकारी देना चाहें तो दो हफ्ते के भीतर दाखिल कर सकते हैं।
(ii) जिनकी तरफ से वकील पेश हुए, लेकिन एफिडेविट नहीं आया
आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, गोवा, मिजोरम, तमिलनाडु, तेलंगाना, पुडुचेरी, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन राज्यों के चीफ सेक्रेटरी को नोटिस जारी हो कि आदेश का पालन न करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न हो।
(iii) जिनकी तरफ से न तो कोई पेश हुआ, न एफिडेविट दाखिल हुआ
गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, अंडमान-निकोबार, दादरा नगर हवेली और दमन-दीव, दिल्ली, लद्दाख, लक्षद्वीप और चंडीगढ़।
इनके लिए कोर्ट ने कहा कि चीफ सेक्रेटरी को नोटिस दिया जाए कि अवमानना (contempt) की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।
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आदेश सुनाए जाने के बाद मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अनुरोध किया गया कि उन्हें आज ही एफिडेविट दाखिल करने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया।
इसके बाद कोर्ट ने “समानता और अनुपात” (parity & proportionality) की बात करते हुए कहा कि जो राज्य श्रेणी (ii) में हैं, अगर वे आज ही आदेश के अनुरूप एफिडेविट दाखिल कर देते हैं, तो उनके चीफ सेक्रेटरी को नोटिस का जवाब देने की जरूरत नहीं होगी।
कोर्ट ने यह भी पाया कि अरुणाचल प्रदेश का एफिडेविट चीफ सेक्रेटरी द्वारा व्यक्तिगत रूप से पुष्टि नहीं किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित चीफ सेक्रेटरी बताएं कि आदेश के बावजूद ऐसा क्यों हुआ।
साथ ही, रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि R-41 को हटाया जाए, क्योंकि UGC पहले से ही R-3 के रूप में रिकॉर्ड में है।
Case Title: Ayesha Jain vs Amity University, Noida & Ors.
Case No.: W.P. (Civil) No. 531/2025
Next Hearing: 28-01-2026
Decision Date: 08-01-2026










