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सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश पलटा: कहा, Article 227 से सीधे plaint नहीं हटाई जा सकती

पी. सुरेश बनाम डी. कलाइवानी और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने दीवानी मुकदमे को बहाल किया, फैसला सुनाया कि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 का उपयोग करके वाद को खारिज नहीं कर सकते जब सीपीसी आदेश VII नियम 11 के तहत एक विशिष्ट उपाय प्रदान करता है।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश पलटा: कहा, Article 227 से सीधे plaint नहीं हटाई जा सकती

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सिद्धांत दोहराया जब सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में किसी राहत के लिए साफ़ प्रावधान मौजूद हो, तो हाईकोर्ट को सीधे संविधान के अनुच्छेद 227 की ताक़त का इस्तेमाल कर plaint (वाद-पत्र) नहीं हटाना चाहिए। अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक संपत्ति विवाद वाले मुकदमे की plaint को Article 227 के तहत ही “struck off” कर दिया गया था। यह फैसला P. Suresh बनाम D. Kalaivani व अन्य मामले में आया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला तमिलनाडु के तांबरम स्थित जिला मुंसिफ अदालत में दाख़िल एक स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) के मुकदमे से जुड़ा है। वादी का कहना था कि ज़मीन उनकी माँ मीना ने 1975 में खरीदी थी, और उनकी मृत्यु के बाद वह अकेले वारिस के तौर पर संपत्ति के कब्ज़े में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब वे ज़मीन पर बाड़ लगाने लगे, तो प्रतिवादियों ने दख़ल दिया।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने बिक्री दस्तावेज़ को जाली बताते हुए चुनौती दी। उनका दावा था कि जिस दस्तावेज़ पर वादी भरोसा कर रहा है, वह किसी तीसरे पक्ष से जुड़ा है और असल में उनकी ही पारिवारिक संपत्ति है। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट में Article 227 के तहत सिविल रिविज़न दायर की।

मद्रास हाईकोर्ट ने वादी के दस्तावेज़ों पर संदेह जताते हुए कहा कि मुकदमा झूठा और धोखाधड़ी पर आधारित है। अदालत ने यह भी नोट किया कि मुकदमा पहले डिफ़ॉल्ट में खारिज हो चुका था और काफी समय तक आगे नहीं बढ़ा। इन बातों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने Article 227 की शक्तियों का इस्तेमाल कर सीधे plaint को ही हटा दिया।

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कोर्ट की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साफ़ कहा कि Article 227 की शक्ति “supervisory” है, यानी निगरानी की, न कि अपील की तरह हर गलती सुधारने की। अदालत ने याद दिलाया कि CPC में Order VII Rule 11 जैसी विशेष व्यवस्था है, जिसके तहत plaint को ख़ारिज करने की अर्जी दी जा सकती है। जब ऐसा वैधानिक रास्ता मौजूद हो, तो उसे दरकिनार कर सीधे संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करना सही नहीं है।

पीठ ने कहा,

“यह अधिकार बहुत सीमित और सावधानी से इस्तेमाल होने वाला है। इसे अपील के भेस में नहीं बदला जा सकता।” अदालत ने यह भी समझाया कि Order VI Rule 16 का मतलब पूरे plaint को उड़ाना नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर किसी हिस्से की आपत्तिजनक भाषा हटाना है।

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अदालत ने ज़ोर दिया कि ज़्यादातर सिविल मुकदमों में तथ्य विवादित होते हैं और उन्हें सबूतों के साथ ट्रायल कोर्ट में ही परखा जाना चाहिए। अगर हर ऐसे मामले में हाईकोर्ट सीधे Article 227 का सहारा ले ले, तो CPC में दिए गए अपील और दूसरी प्रक्रियाओं का मतलब ही ख़त्म हो जाएगा।

“जहाँ CPC में सीधा उपाय उपलब्ध हो, वहाँ Article 227 का इस्तेमाल लगभग पूरी तरह से रोका जाना चाहिए,” पीठ ने कहा।

फैसला

इन कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का 3 जून 2025 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने मुकदमे की plaint बहाल कर दी और पक्षकारों को ट्रायल कोर्ट के सामने आगे की कार्यवाही के लिए पेश होने का निर्देश दिया। साथ ही, प्रतिवादियों को यह छूट दी गई कि वे चाहें तो CPC के Order VII Rule 11 के तहत उचित अर्जी दाख़िल कर सकते हैं, जिसे क़ानून के मुताबिक़ सुना जाएगा।

Case Title:- P. Suresh vs. D. Kalaivani & Others

Bench:- Justice Aravind Kumar and Justice N.V. Anjaria

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