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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी के जूनियर हाई स्कूल शिक्षकों को ₹17,000 मासिक मानदेय, एरियर भी मिलेगा

यू.पी. जूनियर हाई स्कूल काउंसिल इंस्ट्रक्टर वेलफेयर एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य।सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के जूनियर हाई स्कूल प्रशिक्षकों को 2017 से ₹17,000 मानदेय और एरियर देने का आदेश दिया, राज्य सरकार की अपील खारिज।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी के जूनियर हाई स्कूल शिक्षकों को ₹17,000 मासिक मानदेय, एरियर भी मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत पार्ट-टाइम अनुबंधित प्रशिक्षकों/शिक्षकों के मानदेय को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि लंबे समय से कम मानदेय पर काम करा रहे इन शिक्षकों को ₹17,000 प्रतिमाह का भुगतान किया जाए और बकाया राशि भी तय समय में दी जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला उत्तर प्रदेश में 2013 में शुरू हुई भर्ती से जुड़ा है, जब राज्य सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत अपर प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 6 से 8) में कला, कार्य शिक्षा और शारीरिक शिक्षा के लिए पार्ट-टाइम प्रशिक्षकों की नियुक्ति की थी। शुरुआत में इन शिक्षकों को 11 महीने के अनुबंध पर ₹7,000 प्रतिमाह मानदेय दिया गया था।

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समय-समय पर सरकार ने मानदेय बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा। 2016-17 में यह राशि ₹8,470 और 2017-18 में ₹17,000 तक बढ़ाने की मंजूरी भी दी गई, लेकिन वास्तविक भुगतान कम दर पर ही जारी रहा। बाद में मानदेय फिर से घटाकर ₹7,000 कर दिया गया, जिसके खिलाफ शिक्षकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के सिंगल जज ने शिक्षकों को ₹17,000 प्रतिमाह देने का आदेश दिया था, लेकिन डिवीजन बेंच ने यह लाभ केवल वर्ष 2017-18 तक सीमित कर दिया। इसके खिलाफ शिक्षक संघ, राज्य सरकार और व्यक्तिगत शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

अदालत में उठे प्रमुख सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या इन अनुबंधित प्रशिक्षकों का मानदेय समय-समय पर बढ़ाया जाना चाहिए या उन्हें वर्षों तक उसी स्थिर राशि पर रखा जा सकता है।

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शिक्षकों की ओर से कहा गया कि ₹7,000 का मानदेय न्यूनतम मजदूरी से भी कम है और इससे शिक्षा के अधिकार कानून के उद्देश्यों पर असर पड़ता है। वहीं राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह नीति का मामला है और शिक्षक अनुबंध की शर्तें स्वीकार कर चुके हैं।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की भूमिका पर विस्तार से टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण की नींव है। बेंच ने कहा, “शिक्षक युवाओं के चरित्र निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं और उन्हें सम्मानजनक पारिश्रमिक मिलना चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक लगातार काम करने वाले इन प्रशिक्षकों को केवल “पार्ट-टाइम” या “अनुबंधित” कहना वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता। अदालत ने कहा, “जब सरकार उन्हें दूसरी नौकरी करने से रोकती है और वे नियमित शिक्षकों की तरह काम करते हैं, तो वे व्यवहार में पूर्णकालिक शिक्षक ही हैं।”

बेंच ने मानदेय को वर्षों तक स्थिर रखने और बाद में घटाने को मनमाना बताया। कोर्ट ने कहा कि इतनी कम राशि पर काम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत जबरन श्रम (बेगार) जैसा हो सकता है।

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वित्तीय जिम्मेदारी पर अदालत का दृष्टिकोण

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राथमिक शिक्षा योजनाओं में केंद्र और राज्य दोनों की वित्तीय जिम्मेदारी होती है, लेकिन शिक्षकों को भुगतान करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अगर केंद्र अपनी हिस्सेदारी नहीं देता, तो राज्य बाद में उससे वसूली कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी पात्र प्रशिक्षकों को वर्ष 2017-18 से ₹17,000 प्रतिमाह मानदेय दिया जाए। राज्य सरकार को 1 अप्रैल 2026 से यह भुगतान शुरू करने और छह महीने के भीतर बकाया राशि देने का निर्देश दिया गया।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि मानदेय की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और कम से कम हर तीन साल में इसे संशोधित किया जाए।

कोर्ट ने शिक्षक संघ और शिक्षकों की अपील स्वीकार कर ली, जबकि राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

Case Title: U.P. Junior High School Council Instructor Welfare Association vs State of Uttar Pradesh & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 9459 of 2023 & connected matters

Decision Date: 04 February 2026

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