सुप्रीम कोर्ट की अदालत संख्या 7 में सोमवार को एक ऐसा मामला सुना गया, जिसने न्याय व्यवस्था में लंबित अपीलों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। करीब 11 साल जेल में बिताने के बाद भी जिसकी अपील हाईकोर्ट में लंबित रही, उस दोषी को अब सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि न्याय केवल फैसला देने में नहीं, बल्कि समय पर फैसला देने में भी है। आदेश 16 फरवरी 2026 को पारित हुआ।
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मामले की पृष्ठभूमि
मामला ओडिशा के मुन बिसोई से जुड़ा है। सत्र न्यायालय ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 (हत्या) और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सज़ा दी थी।
इसके खिलाफ उन्होंने 2016 में ओडिशा हाईकोर्ट में अपील दायर की। लेकिन सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। इस बीच वे जेल में ही रहे।
अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने सज़ा निलंबित करने की अर्जी खारिज कर दी, हालांकि तीन महीने की अंतरिम जमानत दे दी। यह जमानत 22 जनवरी 2026 तक थी। इसके बाद उन्हें आत्मसमर्पण करना था।
जमानत की अवधि समाप्त होने से पहले ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत की सुनवाई: एक अहम सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ कहा कि अपील का अधिकार कानून से मिला है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहे और बाद में उसकी अपील सफल हो जाए, तो क्या उस बीते समय की भरपाई संभव है?
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पीठ ने कहा, “हमें यह देखकर आश्चर्य नहीं होता कि 2016 में दायर अपील अब तक नहीं सुनी जा सकी।”
हालांकि अदालत ने यह भी जोड़ा कि हाईकोर्ट के पास वास्तविक कारण हो सकते हैं, लेकिन इससे आरोपी के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।
कश्मीरा सिंह मामले का हवाला
पीठ ने 1977 के ऐतिहासिक फैसले कश्मीरा सिंह बनाम पंजाब राज्य का उल्लेख किया। उस फैसले में कहा गया था कि यदि अपील का निपटारा उचित समय में संभव नहीं है, तो लंबी सज़ा काट रहे दोषी को जमानत देने पर विचार होना चाहिए।
उस निर्णय की एक पंक्ति अदालत ने दोहराई- “कोई भी परंपरा, चाहे कितनी ही पुरानी क्यों न हो, यदि वह अन्याय का कारण बनती है, तो उसे जारी नहीं रखा जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि अपील पांच-छह साल तक लंबित रहे और व्यक्ति जेल में रहे, तो यह न्याय की भावना के विपरीत हो सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अदालत ने माना कि अपील लंबित रहने में देरी के लिए दोषी को जिम्मेदार ठहराने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
पीठ ने आदेश दिया कि सत्र न्यायालय द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सज़ा को निलंबित किया जाता है। हाईकोर्ट का 22 अक्टूबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील का अंतिम निर्णय हाईकोर्ट ही करेगा, लेकिन तब तक आरोपी अंतरिम जमानत पर बना रहेगा।
साथ ही हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया कि अपील को छह महीने के भीतर निपटाने का प्रयास किया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि अपीलकर्ता सुनवाई में रुचि नहीं दिखाता, तो हाईकोर्ट स्वयं अमिकस क्यूरी (न्यायालय द्वारा नियुक्त वकील) नियुक्त कर अपील का निर्णय कर सकता है।
Case Title: Muna Bisoi v. State of Odisha
Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) Diary No. 163 of 2026
Decision Date: 16 February 2026










