दिल्ली और उत्तर प्रदेश में फैले कथित करोड़ों रुपये के फर्जीवाड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि आरोपी के आपराधिक इतिहास और फरार रहने के तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद FIR संख्या 0568/2023 से जुड़ा है, जो उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रीसिया थाने में दर्ज हुई थी। शिकायतकर्ता राकेश मित्तल ने आरोप लगाया था कि उन्होंने आरोपियों को खाद्यान्न की आपूर्ति की थी, जिसकी कुल कीमत ₹11.52 करोड़ थी।
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उनके मुताबिक उन्हें केवल ₹5.02 करोड़ ही मिले। बाकी रकम के लिए दिए गए चेक बाउंस हो गए। जांच के दौरान आरोप सामने आए कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेज और अलग-अलग नामों का इस्तेमाल कर धोखाधड़ी की।
आरोपी अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी को अगस्त 2025 में गिरफ्तार किया गया। उससे तीन आधार कार्ड और एक पैन कार्ड बरामद हुआ, जिनमें अलग-अलग नाम और पिता का नाम दर्ज था।
राज्य सरकार ने अदालत में बताया कि आरोपी ने “8 से 10 अलग-अलग नामों का इस्तेमाल किया” और वह करीब 20 महीने तक फरार रहा।
हाई कोर्ट का आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने 12 नवंबर 2025 को आरोपी को जमानत दे दी थी। अदालत ने यह कहते हुए राहत दी कि सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और मामला मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए कई गंभीर पहलुओं पर जोर दिया।
पीठ ने कहा, “केवल समानता (parity) के आधार पर जमानत देना उचित नहीं था, खासकर तब जब आरोपी का आपराधिक इतिहास और आचरण अलग प्रकृति का हो।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में धारा 409 और 467 आईपीसी जैसे गंभीर अपराध जोड़े गए हैं, जिनमें आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। इसलिए यह मान लेना कि मामला केवल मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है, “समयपूर्व और अधूरा निष्कर्ष” था।
पीठ ने कहा, “व्यक्ति की स्वतंत्रता निस्संदेह मूल्यवान है, परंतु जब कोई व्यक्ति समाज के लिए खतरा बन जाए तो कानून के तहत उसकी स्वतंत्रता सीमित की जा सकती है।”
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आपराधिक इतिहास पर अदालत की सख्ती
राज्य सरकार ने बताया कि आरोपी के खिलाफ पहले भी कई एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें दिल्ली और उत्तर प्रदेश के मामले शामिल हैं। एक पुराने मामले में जमानत मिलने के बाद वह ट्रायल में पेश नहीं हुआ और गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि आरोपी का “फरार रहना, फर्जी पहचान बनाना और पूर्व में जमानत का दुरुपयोग करना” गंभीर संकेत हैं।
पीठ ने टिप्पणी की, “ऐसे व्यक्ति को बिना समुचित परीक्षण के समाज में छोड़ देना अन्य लोगों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।”
समानता का सिद्धांत (Parity) क्यों नहीं लागू हुआ?
अदालत ने स्पष्ट किया कि हर आरोपी की भूमिका और पृष्ठभूमि अलग होती है। केवल इसलिए कि सह-आरोपी को जमानत मिल गई, मुख्य आरोपी को भी वही राहत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि जमानत देते समय महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई हो, तो उच्च अदालत उस आदेश को रद्द कर सकती है।
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अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 12 नवंबर 2025 का हाई कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी हिरासत में ही रहेगा। साथ ही राज्य सरकार को ट्रायल को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया।
अपील स्वीकार कर ली गई।
Case Title: Rakesh Mittal vs Ajay Pal Gupta @ Sonu Chaudhary & Anr.
Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 19708 of 2025
Decision Date: 17 February 2026










