बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने पति द्वारा दायर तलाक अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ अलग रहना “डेज़र्शन” (त्याग) नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के और पति की इच्छा के खिलाफ घर छोड़कर गई।
यह मामला MFA No. 918 of 2021 से जुड़ा था, जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट, चिक्कमगलूरु के आदेश को चुनौती दी थी।
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मामले की पृष्ठभूमि
पति-पत्नी का विवाह 4 दिसंबर 2011 को चित्रदुर्गा में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के बाद दोनों साथ रहे और एक बेटी भी हुई।
पति का आरोप था कि पत्नी 2015 से बिना किसी वजह के मायके चली गई और वापस नहीं लौटी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से संबंध था। इस दौरान पत्नी ने पति के खिलाफ धारा 498A आईपीसी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया, जिसमें बाद में पति बरी हो गया।
पति ने पहले भी तलाक याचिका दायर की थी, लेकिन कथित समझौते की उम्मीद में उसे वापस ले लिया। बाद में उसने फिर से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(b) के तहत “डेज़र्शन” के आधार पर तलाक मांगा।
फैमिली कोर्ट ने 27 जनवरी 2020 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पति “डेज़र्शन” साबित करने में असफल रहा।
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हाईकोर्ट में क्या हुआ?
हाईकोर्ट में पत्नी पेश नहीं हुईं। अदालत ने 7 जून 2024 को अधिवक्ता अर्चना के.एम. को अमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया ताकि पत्नी की ओर से कानूनी सहायता मिल सके।
पति की ओर से दलील दी गई कि 2015 से दोनों के बीच कोई सह-निवास नहीं है और विवाह “अप्रत्यक्ष रूप से टूट चुका” है। उनके वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने तकनीकी आधार पर याचिका खारिज की और पति द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ
पीठ ने साफ शब्दों में कहा, “सिर्फ लंबे समय तक अलग रहना, अपने आप में डेज़र्शन नहीं है।”
अदालत ने समझाया कि डेज़र्शन साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि अलग रहने वाला जीवनसाथी जानबूझकर और बिना उचित कारण के, दूसरे की इच्छा के खिलाफ अलग रह रहा है।
बेंच ने यह भी कहा कि पति द्वारा पत्नी पर लगाए गए विवाहेतर संबंध के आरोप का कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी से सहमति जताई कि “बिना प्रमाण के ऐसे आरोप स्वयं मानसिक क्रूरता हो सकते हैं और पत्नी के अलग रहने का कारण भी बन सकते हैं।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मामले में बरी होना, अपने आप में डेज़र्शन का प्रमाण नहीं बनता।
सबूत और कानूनी जिम्मेदारी पर कोर्ट का रुख
पीठ ने कहा कि जो पक्ष अदालत में राहत मांगता है, उस पर अपने दावे को साबित करने की जिम्मेदारी होती है।
अदालत ने स्पष्ट किया, “याचिकाकर्ता को अपने ही साक्ष्यों के आधार पर केस सिद्ध करना होता है, चाहे दूसरा पक्ष उपस्थित हो या नहीं।”
यह भी कहा गया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी ने जानबूझकर और बिना उचित कारण के पति को छोड़ दिया।
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अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया।
पीठ ने कहा कि पति डेज़र्शन के आवश्यक तत्व साबित करने में असफल रहा है। इसलिए अपील खारिज की जाती है।
साथ ही अदालत ने अमिकस क्यूरी के रूप में सहायता देने वाली अधिवक्ता के प्रति आभार व्यक्त किया और कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को उन्हें 10,000 रुपये पारिश्रमिक देने का निर्देश दिया।
Case Title: Husband vs Wife
Case No.: MFA No. 918 of 2021










