नई दिल्ली में आज सुप्रीम कोर्ट में माहौल असामान्य रूप से गंभीर था। छह साल की मासूम बच्ची की रहस्यमयी मौत और उसके सौतेले पिता की सजा-मामला भावनात्मक भी था और कानूनी रूप से जटिल भी। आखिरकार, अदालत ने कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने आरोपी रोहित जांगड़े को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा, “संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”
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मामले की पृष्ठभूमि
घटना 5 अक्टूबर 2018 की है। आरोपी रोहित जांगड़े अपनी दूसरी पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था। उसी दिन पत्नी के साथ विवाद हुआ और कथित मारपीट के बाद पत्नी मायके चली गई।
परिवार को बताया गया कि बच्ची आरोपी के साथ गई है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि 11 अक्टूबर तक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई।
बाद में पुलिस ने दावा किया कि आरोपी की सूचना पर खेत से जली हुई हड्डियाँ और पास की नहर से खोपड़ी व दाँत बरामद किए गए। डीएनए जांच में नहर से मिले कशेरुका (रीढ़ की हड्डी का हिस्सा) और दाँत का मिलान बच्ची के जैविक माता-पिता से हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने इन्हीं परिस्थितियों-
1. “लास्ट सीन” सिद्धांत (आखिरी बार साथ देखा जाना),
2. आरोपी की निशानदेही पर बरामदगी,
3. डीएनए मिलान-के आधार पर दोषसिद्धि की। हाईकोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी।
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कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जांच पर गंभीर सवाल उठाए। रिकॉर्ड में आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख को लेकर काट-छांट (interpolation) दिखाई दी। इससे “लास्ट सीन” सिद्धांत कमजोर पड़ गया।
पीठ ने कहा कि यदि आरोपी 6 अक्टूबर को गिरफ्तार होकर 8 अक्टूबर को जमानत पर छूट चुका था, तो फिर 6 अक्टूबर की रात बच्ची के गायब होने की कहानी पर संदेह पैदा होता है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि गुमशुदगी की रिपोर्ट में देरी हुई, जबकि परिवार और पुलिस को पहले से पता था कि बच्ची आरोपी के साथ गई थी।
धारा 27 और बरामदगी पर सवाल
पुलिस ने कहा कि आरोपी के बयान के आधार पर बरामदगी हुई। लेकिन अदालत ने पाया कि जिस समय बयान लिया गया, आरोपी पुलिस हिरासत में नहीं था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 तभी लागू होती है जब आरोपी पुलिस की हिरासत में हो। यहाँ वह शर्त पूरी नहीं हुई।
हालांकि अदालत ने माना कि आरोपी द्वारा स्थान बताना धारा 8 (आचरण) के तहत एक परिस्थिति हो सकता है, पर यह “कमजोर कड़ी” है।
अदालत ने कहा, “केवल इस आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। यह अधिकतम परिस्थितियों की श्रृंखला में एक कड़ी हो सकती है।”
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डीएनए साक्ष्य पर अदालत की राय
डीएनए मिलान केवल नहर से मिले कशेरुका और दाँत से हुआ। खेत से मिली अन्य हड्डियाँ और खोपड़ी मेल नहीं खाईं।
अदालत ने माना कि इससे बच्ची की मृत्यु सिद्ध होती है, लेकिन यह आरोपी की संलिप्तता को स्वतः सिद्ध नहीं करता।
पीठ ने कहा कि आरोपी से पूछताछ के दौरान डीएनए रिपोर्ट से जुड़े प्रश्न पूछे गए थे और उसने सामान्य इनकार किया।
निर्णय
अंत में अदालत ने कहा कि अभियोजन पूरी परिस्थितियों की ऐसी श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका जो केवल आरोपी की दोषसिद्धि की ओर ही इशारा करे।
लंबा अंतराल, गिरफ्तारी को लेकर संदेह, गुमशुदगी रिपोर्ट में देरी और बरामदगी की कानूनी स्थिति-इन सबने अभियोजन की कहानी को कमजोर कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट कहा, “हम इस दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रख सकते। आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।”
इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश रद्द कर दिए गए। आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
Case Title: Rohit Jangde v. State of Chhattisgarh
Case No.: Criminal Appeal No. 689 of 2026 (@ SLP (Crl.) No. 5624 of 2024)
Decision Date: February 17, 2026
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