जयपुर बेंच में मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान अदालत का रुख साफ था—किसी कर्मचारी का वैध हक सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि विभाग आर्थिक तंगी से गुजर रहा है। न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) को 1998 से 2011 तक के साप्ताहिक अवकाश का भुगतान ब्याज सहित करने का निर्देश दिया।
यह आदेश मोहन सिंह की याचिका पर पारित हुआ, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद अपने बकाया भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। आदेश की प्रति में उपलब्ध है।
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मामले की पृष्ठभूमि
अजमेर जिले के निवासी मोहन सिंह ने वर्ष 2014 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली थी। इसके बाद उनके और निगम के बीच भुगतान को लेकर विवाद खड़ा हुआ। मामला राष्ट्रीय लोक अदालत में गया और 12 दिसंबर 2015 को समझौता हुआ।
लोक अदालत में निगम ने यह सहमति दी थी कि सभी देयकों की जांच कर नौ माह के भीतर भुगतान किया जाएगा और 6% वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अधिकांश भुगतान हो चुका है, लेकिन 1998 से 2011 तक के साप्ताहिक विश्राम (वीकली रेस्ट) का भुगतान अभी तक लंबित है। इस संबंध में 23 अप्रैल 2014 को मैनेजर (ऑपरेशन), अजमेर डिपो द्वारा जारी प्रमाणपत्र भी रिकॉर्ड पर रखा गया।
निगम की ओर से पेश वकील ने 3 नवंबर 2021 के एक सर्कुलर का हवाला दिया। उनका कहना था कि निगम की वित्तीय स्थिति को देखते हुए भुगतान की प्राथमिकताएं तय की गई हैं।
इस सर्कुलर में वेतन, पेंशन, डीजल, आवश्यक रखरखाव और कुछ अन्य मदों को प्राथमिकता दी गई थी। इसी आधार पर पहले भी कुछ याचिकाएं निपटाई गई थीं।
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अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि आर्थिक संकट का बहाना बनाकर कर्मचारी के वैध अधिकार को नहीं टाला जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की, “यह भले ही कुप्रबंधन या वित्तीय अव्यवस्था का परिणाम हो कि निगम कठिनाई में है, लेकिन इसका कर्मचारी के हक से कोई लेना-देना नहीं है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि सरकार निगम के प्रबंधन को लेकर गंभीर है, तो उसे पहले प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए थी।
पीठ ने कहा, “ड्राइवर, कंडक्टर और तकनीकी स्टाफ ही सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ हैं। केवल आर्थिक तंगी का हवाला देकर समझौता पुरस्कार का पालन नहीं टाला जा सकता।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब लोक अदालत में समझौता हो चुका है और देनदारी प्रमाणित है, तो भुगतान से बचने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
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अदालत का निर्णय
रिकॉर्ड और तर्कों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने माना कि 1998 से 2011 तक के साप्ताहिक अवकाश का भुगतान करने की देनदारी से निगम इंकार नहीं कर सकता।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि मैनेजर (ऑपरेशन), अजमेर डिपो द्वारा प्रमाणित राशि का भुगतान किया जाए। यह भुगतान लोक अदालत में सहमति के अनुसार ब्याज सहित दो माह के भीतर किया जाना होगा।
इसके साथ ही रिट याचिका और उससे जुड़ी अन्य अर्जियां निस्तारित कर दी गईं।
Case Title: Mohan Singh v. Rajasthan State Road Transport Corporation & Ors.
Case No.: S.B. Civil Writ Petition No. 12751/2020
Decision Date: 03 February 2026










