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धारा 498A के दुरुपयोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पति और परिवार के खिलाफ मामला रद्द किया

X और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य - कर्नाटक उच्च न्यायालय ने प्रक्रिया के दुरुपयोग, सबूतों की कमी और वैवाहिक विवाद में आपराधिक कानून के दुरुपयोग का हवाला देते हुए धारा 498ए और दहेज अधिनियम के मामले को रद्द कर दिया।

Shivam Y.
धारा 498A के दुरुपयोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पति और परिवार के खिलाफ मामला रद्द किया

बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम आदेश में दहेज और वैवाहिक क्रूरता से जुड़े आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपों का समर्थन नहीं करती और इस तरह की कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बन जाती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सथनूर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ था, जो बाद में कनकपुरा की अदालत में सीसी नंबर 562/2021 के रूप में लंबित था। पत्नी (शिकायतकर्ता) ने अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों पर आईपीसी की धारा 498A, 406, 504, 506 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए थे।

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रिकॉर्ड के अनुसार, शादी 1 मार्च 2020 को हुई और शिकायत 16 सितंबर 2020 को दर्ज कराई गई। शिकायत में आरोप था कि शादी के बाद से जून 2020 तक दहेज की मांग और प्रताड़ना होती रही। पति पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

न्यायमूर्ति एम. जी. उमा की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और केस डायरी तथा दस्तावेजों का अध्ययन किया। अदालत ने नोट किया कि पति ने पहले ही जुलाई और अगस्त 2020 में पुलिस में शिकायतें की थीं और तलाक के लिए कानूनी नोटिस भी भेजा था। इसके जवाब और उस समय दिए गए बयानों में पत्नी की ओर से ऐसे गंभीर आरोपों का कोई उल्लेख नहीं मिला।

पीठ ने यह भी देखा कि शिकायतकर्ता के परिवार की आर्थिक स्थिति से जुड़े दस्तावेज जैसे बीपीएल राशन कार्ड और सरकारी योजना के लाभ रिकॉर्ड पर रखे गए थे। अदालत ने कहा कि जब परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आता है, तो भारी रकम और बड़ी मात्रा में सोना-चांदी दिए जाने के दावे की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

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न्यायालय ने टिप्पणी की,

“जांच अधिकारी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि कथित दहेज की रकम और कीमती वस्तुएं कहां से आईं। बिना प्राथमिक जांच के एफआईआर दर्ज करना और गिरफ्तारी करना गंभीर परिणाम पैदा करता है।”

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया है कि वैवाहिक विवादों में सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी दोहराया कि धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा है, लेकिन इसके दुरुपयोग से निर्दोष लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

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आदेश में यह तथ्य भी दर्ज किया गया कि पति को सितंबर 2020 में गिरफ्तार कर कुछ दिन हिरासत में रखा गया था। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बावजूद, ऐसे मामलों में अक्सर बिना पर्याप्त आधार के गिरफ्तारी कर ली जाती है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर डालती है।

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत में लगाए गए आरोप “सामान्य, व्यापक और बिना ठोस आधार” के हैं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है जिससे मुकदमा जारी रखा जाए।

अदालत ने आदेश दिया कि सथनूर पुलिस स्टेशन के क्राइम नंबर 128/2020 से जुड़े सभी आपराधिक कार्यवाही और कनकपुरा की अदालत में लंबित मामला रद्द किया जाता है। इसी के साथ याचिका स्वीकार कर ली गई।

Case Title:- X & Others v/s State of Karnataka & Anr.

Case Number: Criminal Petition No. 7331 of 2021

Date of Decision: 19 January 2026

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