जयपुर बेंच में शुक्रवार को हुई सुनवाई में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम सवाल पर अपना फैसला सुनाया-क्या बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) को “डिग्री इन मेडिसिन” माना जा सकता है?
न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकल पीठ ने साफ कहा कि भर्ती के लिए निर्धारित योग्यता में अदालत दखल नहीं दे सकती। इसी आधार पर फूड सेफ्टी ऑफिसर पद के लिए एक अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी गई।
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मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अरविंद कुमार गुप्ता ने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के 23 अप्रैल 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। आयोग ने उनकी उम्मीदवारी इसलिए रद्द कर दी थी क्योंकि उनके पास “डिग्री इन मेडिसिन” नहीं थी।
दरअसल, वर्ष 2019 में फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद के लिए विज्ञापन जारी हुआ था। उसमें खाद्य प्रौद्योगिकी, बायोटेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर साइंस, वेटरनरी साइंस, माइक्रोबायोलॉजी या “डिग्री इन मेडिसिन” जैसी योग्यताएँ मांगी गई थीं।
याचिकाकर्ता के पास राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज से बीडीएस की डिग्री थी। उनका तर्क था कि बीडीएस भी आधुनिक चिकित्सा की ही एक शाखा है, इसलिए उन्हें पात्र माना जाना चाहिए।
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याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ रांका ने दलील दी कि भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1956 में “मेडिसिन” की परिभाषा आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा की सभी शाखाओं को शामिल करती है।
उन्होंने अदालत में कहा, “जब कानून में मेडिसिन को सभी शाखाओं सहित परिभाषित किया गया है और केवल वेटरनरी मेडिसिन को बाहर रखा गया है, तो डेंटल सर्जरी को अलग नहीं किया जा सकता।”
उन्होंने यह भी बताया कि एम्स, नई दिल्ली और जिपमर, पुदुचेरी से आरटीआई के तहत मिली जानकारी में डेंटल सर्जरी को मेडिसिन की शाखा बताया गया है।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के एक फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें बीडीएस धारकों को फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती में पात्र माना गया था।
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सरकार और आरपीएससी का पक्ष
सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि “डिग्री इन मेडिसिन” का अर्थ एमबीबीएस और उससे संबंधित शाखाएँ हैं-जैसे रेडियोलॉजी, कार्डियोलॉजी, पीडियाट्रिक्स आदि।
उन्होंने अदालत से कहा, “राज्य एक नियोक्ता के रूप में यह तय करने का अधिकार रखता है कि किसी पद के लिए कौन-सी शैक्षणिक योग्यता उपयुक्त है।”
सरकार ने यह भी बताया कि फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने स्पष्ट किया है कि “डिग्री इन मेडिसिन” में अन्य प्रणालियाँ शामिल नहीं हैं।
तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि विशेषज्ञ समिति ने बीडीएस और एमडीएस को ‘डिग्री इन मेडिसिन’ के बराबर नहीं माना था।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने बार-बार यह रेखांकित किया कि भर्ती प्रक्रिया में योग्यताओं का निर्धारण नियोक्ता का अधिकार है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा, “योग्यता की समकक्षता तय करना एक तकनीकी और शैक्षणिक विषय है, जिसे अदालत नहीं तय कर सकती।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की सीमा सीमित है। अदालत भर्ती नियमों को बदल या विस्तार नहीं दे सकती।
न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि जब विशेषज्ञ समिति पहले ही बीडीएस को ‘डिग्री इन मेडिसिन’ नहीं मान चुकी है, तो इसमें दखल देने का कोई आधार नहीं बनता।
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अंतिम निर्णय
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि बीडीएस डिग्री को “डिग्री इन मेडिसिन” नहीं कहा जा सकता।
न्यायमूर्ति आनंद शर्मा ने कहा, “इस न्यायालय के पास ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है कि वह निर्धारित पात्रता मानदंड में संशोधन या विस्तार करे।”
इसी आधार पर याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया। लंबित सभी आवेदन भी निरस्त कर दिए गए।
Case Title: Arvind Kumar Gupta v. State of Rajasthan & Ors.
Case No.: S.B. Civil Writ Petition No. 7617/2025
Decision Date: 29 August 2025










