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गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 37 साल बाद बेटी का संपत्ति दावा खारिज नहीं, स्टे आंशिक बरकरार

यूसुफभाई वलीभाई पटेल एवं अन्य बनाम जुबेदाबेन अब्बासभाई पटेल एवं अन्य, गुजरात हाईकोर्ट ने 37 साल बाद दायर बेटी के संपत्ति दावे को खारिज करने से इनकार किया, अंतरिम स्टे आंशिक रूप से बरकरार।

Vivek G.
गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 37 साल बाद बेटी का संपत्ति दावा खारिज नहीं, स्टे आंशिक बरकरार

अहमदाबाद स्थित Gujarat High Court में मंगलवार को एक पारिवारिक संपत्ति विवाद पर लंबी सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया गया। मामला भाई-बहनों के बीच पैतृक संपत्ति और कथित पारिवारिक समझौते को लेकर था।

न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी की अदालत में दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों ने विस्तार से दलीलें दीं। अदालत ने एक साथ लंबित सिविल रिवीजन आवेदन और तीन अपीलों पर फैसला सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद वडोदरा की स्पेशल सिविल सूट संख्या 132/2021 से जुड़ा है। वादी, जो दिवंगत वलीमोहम्मद कादुजी और आयशाबिबी की पुत्री हैं, ने संपत्ति के प्रशासन (Administration of Estate) की मांग की। उनका कहना है कि पिता द्वारा खरीदी गई संपत्तियां भाइयों के नाम पर थीं, लेकिन वे वास्तव में पारिवारिक संपत्ति थीं।

वादी ने दावा किया कि भाइयों ने वर्षों तक उन्हें हिस्सा देने का आश्वासन दिया, पर बाद में जमीनें बेच दीं और “जुमेराह पार्क” नामक परियोजना शुरू कर दी। इसके बाद उन्हें अपने अधिकार से वंचित होने का एहसास हुआ।

दूसरी ओर, प्रतिवादी भाइयों ने तर्क दिया कि 1983 में पारिवारिक समझौता हो चुका था। उनके अनुसार, उस समझौते के तहत बहनों को ₹30,000 देने पर सहमति बनी थी और राजस्व अभिलेखों में नामांतरण भी हो गया था।

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निचली अदालत का आदेश

ट्रायल कोर्ट ने वादी की अंतरिम निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की मांग को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कुछ संपत्तियों पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया, जबकि पहले से बिक चुकी संपत्तियों को बाहर रखा गया।

इसी आदेश के खिलाफ अपीलें दायर की गईं। साथ ही, प्रतिवादियों ने दलील दी कि मुकदमा 37 साल बाद दायर हुआ है, इसलिए इसे समयसीमा (Limitation) के आधार पर प्रारंभ में ही खारिज किया जाए।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “प्लेंट को खारिज करने की शक्ति बहुत कठोर है और इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”

अदालत ने कहा कि जब वादी यह दावा करती है कि उसे अपने अधिकार से वंचित किए जाने की जानकारी बाद में मिली, तो यह एक तथ्यात्मक प्रश्न बन जाता है। “सीमाबंदी का मुद्दा इस मामले में कानून और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है, जिसे साक्ष्य के बिना तय नहीं किया जा सकता,” अदालत ने कहा।

न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि राजस्व प्रविष्टियां (Mutation Entries) केवल राजस्व प्रयोजन के लिए होती हैं, वे स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं हैं।

अंतरिम आदेश पर विचार करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत को दोहराया कि अपीलीय अदालत केवल तभी हस्तक्षेप करेगी जब निचली अदालत का आदेश मनमाना या कानून के विपरीत हो।

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“ट्रायल कोर्ट ने तीन सिद्धांत-प्रथमदृष्टया मामला, संतुलन की सुविधा और अपूरणीय क्षति-पर विचार किया है,” अदालत ने कहा।

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन आवेदनों को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर वादी की याचिका को समयसीमा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

तीनों अपीलों पर निर्णय देते हुए अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का अंतरिम आदेश मनमाना या कानून के विपरीत नहीं है। इसलिए आंशिक यथास्थिति का आदेश बरकरार रखा गया।

मामले को अब ट्रायल कोर्ट में साक्ष्य और अंतिम सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया जाएगा।

Case Title: Yusufbhai Walibhai Patel & Ors. v. Zubedaben Abbasbhai Patel & Ors.

Case No.: R/Civil Revision Application No. 48 of 2023 (with connected matters)

Decision Date: 10 February 2026

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