लखनऊ बेंच में मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में असामान्य सन्नाटा था। मामला व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा था। प्रश्न सीधा था-क्या पुलिस ने गिरफ्तारी के समय कानून का पालन किया? और यदि नहीं, तो क्या हिरासत जारी रह सकती है?
इसी सवाल पर फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने शिवम चौरसिया की गिरफ्तारी और न्यायिक रिमांड को अवैध घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में न देना संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन है।
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मामले की पृष्ठभूमि
शिवम चौरसिया के खिलाफ 21 जनवरी 2026 को प्रतापगढ़ के कंधई थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। आरोप भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत थे।
याचिका के अनुसार, 28 जनवरी को पुलिस ने उन्हें थाने बुलाया और उसी शाम गिरफ्तारी मेमो पर हस्ताक्षर करवा लिए। परिवार को देर से सूचना दी गई।
अगले दिन, 29 जनवरी को विशेष पॉक्सो अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
शिवम की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका में कहा गया कि गिरफ्तारी मेमो में केवल केस नंबर और धाराएँ लिखी थीं, लेकिन गिरफ्तारी के ठोस कारण नहीं बताए गए।
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अदालत में बहस
याचिकाकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Mihir Rajesh Shah बनाम महाराष्ट्र राज्य के अनुसार गिरफ्तारी के “स्पष्ट और लिखित कारण” देना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा, “केवल धाराएँ लिख देना पर्याप्त नहीं है। आरोपी को यह जानने का अधिकार है कि उसे क्यों पकड़ा गया।”
सरकारी पक्ष ने तर्क दिया कि अलग से कारणों की प्रति दी गई थी और आरोपी के हस्ताक्षर भी हैं। साथ ही, यह भी कहा गया कि अब जब मजिस्ट्रेट ने रिमांड दे दिया है, तो गिरफ्तारी की कथित खामी खत्म हो जाती है।
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
पीठ ने गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी का बारीकी से परीक्षण किया।
न्यायालय ने पाया कि मेमो के कॉलम 12 और 13-जहाँ गिरफ्तारी के कारण दर्ज होने चाहिए थे-खाली थे। अलग कागज पर दिए गए कारणों का मेमो में कहीं उल्लेख नहीं था।
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अदालत ने सख्त लहजे में कहा,
“गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना महज औपचारिकता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार की सुरक्षा है।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि यदि गिरफ्तारी ही असंवैधानिक है, तो उस पर आधारित रिमांड आदेश भी टिक नहीं सकता।
“जब नींव ही अवैध हो, तो उस पर खड़ी संरचना कैसे वैध रह सकती है?”
कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट ने भी इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया और रिमांड आदेश यांत्रिक तरीके से पारित किया गया।
हैबियस कॉर्पस पर स्पष्ट रुख
राज्य की आपत्ति थी कि रिमांड आदेश के बाद हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
लेकिन अदालत ने कहा कि यदि रिमांड आदेश “पूर्णतः यांत्रिक” या अधिकार क्षेत्र के बिना है, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की जा सकती है।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और प्रक्रिया का पालन न होने पर हिरासत को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
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अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी में संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं हुआ।
अदालत ने शिवम चौरसिया की गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया और 29 जनवरी 2026 का रिमांड आदेश रद्द कर दिया।
आदेश में स्पष्ट कहा गया कि याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि राज्य कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।
Case Title: Shivam Chaurasiya Thru. His Brother vs State of U.P. & Others
Case No.: Habeas Corpus Writ Petition No. 47 of 2026
Decision Date: 10 February 2026










