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केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ड्राइवर के 'गिल्टी प्ली' से तय नहीं होगी लापरवाही, ट्रिब्यूनल को फिर सुनवाई का आदेश

मेनन पी.एस. बनाम रजिस्ट्रार जनरल, केरल उच्च न्यायालय और अन्य। केरल हाईकोर्ट ने कहा कि ड्राइवर का आपराधिक अदालत में दोष स्वीकार करना मोटर दुर्घटना दावे में लापरवाही का अंतिम प्रमाण नहीं है।

Vivek G.
केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ड्राइवर के 'गिल्टी प्ली' से तय नहीं होगी लापरवाही, ट्रिब्यूनल को फिर सुनवाई का आदेश

केरल हाईकोर्ट में बुधवार को एक दिलचस्प सवाल उठा-क्या मोटर दुर्घटना मामले में ड्राइवर का आपराधिक अदालत में “गिल्टी प्ली” यानी दोष स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त है, जिससे बीमा और मालिक पर सिविल जिम्मेदारी तय कर दी जाए?

केरल हाईकोर्ट के जस्टिस मोहम्मद नियास सी.पी. की एकल पीठ ने साफ कहा कि नहीं। अदालत ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), त्रिशूर के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल को स्वतंत्र रूप से लापरवाही तय करनी होगी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जो 9 फरवरी 2013 को त्रिशूर के चेम्बुक्कावु जंक्शन पर हुई थी। हादसे में हाईकोर्ट की आधिकारिक इनोवा कार और एक टोयोटा कोरोला शामिल थीं।

दावे के मुताबिक, कोरोला कार साइड रोड से तेज रफ्तार में आई और जजों के दौरे पर जा रही हाईकोर्ट की गाड़ी से टकरा गई। वहीं कार मालिक मेनन पी.एस. का कहना था कि उनकी कार सड़क पार कर रही थी, तभी हाईकोर्ट वाहन तेज और लापरवाही से चलाया गया और उसने पीछे से टक्कर मारी।

हादसे के बाद आपराधिक मामला दर्ज हुआ और कोरोला के ड्राइवर ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में दोष स्वीकार कर लिया। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने माना कि लापरवाही तय हो चुकी है और आगे किसी फोरेंसिक या स्वतंत्र साक्ष्य की जरूरत नहीं।

ट्रिब्यूनल ने मेनन की दो अर्जियां खारिज कर दीं, जिनमें उन्होंने वैज्ञानिक सहायक (Scientific Assistant) को बुलाने और पेंट सैंपल तुलना रिपोर्ट पेश करने की अनुमति मांगी थी।

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, त्रिशूर ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिए कि ड्राइवर पहले ही दोष स्वीकार कर चुका है। इसलिए अतिरिक्त गवाह या दस्तावेज बुलाने की आवश्यकता नहीं है।

यही आदेश मेनन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। आदेश का संदर्भ 2026:KER:12467 में दर्ज है।

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हाईकोर्ट में सुनवाई

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि आपराधिक कार्यवाही और मोटर वाहन दावा कार्यवाही अलग प्रकृति की होती हैं। उन्होंने कहा, “ड्राइवर का दोष स्वीकार करना मालिक के खिलाफ स्वतः सिविल जिम्मेदारी तय नहीं कर सकता।”

पीठ ने इस दलील पर गंभीरता से विचार किया। अदालत ने कहा, “मोटर दुर्घटना दावा कार्यवाही सिविल प्रकृति की है और इसमें लापरवाही का निर्धारण ‘प्रेपॉन्डरेंस ऑफ प्रॉबेबिलिटी’ यानी संभावनाओं के आधार पर किया जाता है, न कि आपराधिक मानक पर।”

न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि आपराधिक अदालत का फैसला, खासकर जब वह दोष स्वीकार करने पर आधारित हो, अधिकतम एक साक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है। उसे अंतिम और निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत की टिप्पणी

पीठ ने कहा, “केवल इस आधार पर कि ड्राइवर ने आपराधिक मामले में दोष स्वीकार किया, ट्रिब्यूनल स्वतंत्र साक्ष्य को दरकिनार नहीं कर सकता।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि मालिक स्वयं आपराधिक मामले में आरोपी नहीं था। ऐसे में उसे सिविल कार्यवाही में लापरवाही पर अपना पक्ष रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए।

“ट्रिब्यूनल का यह दृष्टिकोण स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है,” अदालत ने कहा।

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अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा 7 सितंबर 2023 को पारित आदेशों को अस्थिर (unsustainable) बताते हुए रद्द कर दिया।

अदालत ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की अर्जियों पर कानून के अनुसार पुनर्विचार करे और लापरवाही के मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से निर्णय दे।

इसके साथ ही मूल याचिका स्वीकार कर ली गई।

Case Title: Menon P.S. v. Registrar General, High Court of Kerala & Ors.

Case No.: OP (MAC) No. 18 of 2024

Decision Date: 11 February 2026

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