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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: IBC के तहत स्पेक्ट्रम नहीं बनेगा कंपनी की संपत्ति, सरकार का हक़ बरकरार

भारतीय स्टेट बैंक बनाम भारत संघ एवं अन्य। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पेक्ट्रम प्राकृतिक संसाधन है, IBC के तहत कंपनी की संपत्ति नहीं माना जा सकता, सरकार का नियंत्रण बरकरार।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: IBC के तहत स्पेक्ट्रम नहीं बनेगा कंपनी की संपत्ति, सरकार का हक़ बरकरार

नई दिल्ली में भरी अदालत में आज एक अहम संवैधानिक सवाल पर सुनवाई पूरी हुई। मामला था-क्या टेलीकॉम कंपनियां दिवाला प्रक्रिया (IBC) का सहारा लेकर सरकार के बकाया लाइसेंस शुल्क से बच सकती हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्पेक्ट्रम कोई साधारण संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्राकृतिक संपदा है। इसे कंपनियों की “एसेट” मानकर दिवाला प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जा सकता।

यह फैसला Supreme Court of India ने State Bank of India बनाम Union of India सहित कई अपीलों में सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

एयरसेल समूह की कंपनियों को दूरसंचार विभाग (DoT) ने यूनिफाइड एक्सेस सर्विस लाइसेंस के तहत स्पेक्ट्रम उपयोग का अधिकार दिया था। इन कंपनियों ने बैंकों से हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया।

जब लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क (AGR) का भुगतान नहीं हुआ, तो DoT ने वसूली की कार्रवाई शुरू की। इसी बीच कंपनियों ने खुद ही IBC के तहत कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू करा दिया।

बैंकों की अगुवाई SBI कर रहा था। दूसरी ओर, सरकार का कहना था कि स्पेक्ट्रम राष्ट्र की संपत्ति है, इसे दिवाला कानून के तहत “बेचा” या “हस्तांतरित” नहीं किया जा सकता।

कोर्ट में उठे मुख्य सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने कई मूलभूत प्रश्न उठाए-

  • क्या स्पेक्ट्रम पर कंपनियों का मालिकाना हक है?
  • क्या लाइसेंस के तहत मिला “राइट टू यूज़” संपत्ति माना जा सकता है?
  • क्या सरकार का बकाया “ऑपरेशनल डेब्ट” है?
  • क्या IBC, टेलीकॉम कानूनों से ऊपर है?

अदालत ने साफ कहा, “स्पेक्ट्रम एक सीमित प्राकृतिक संसाधन है। यह जनता का है, सरकार केवल उसकी ट्रस्टी है।”

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स्पेक्ट्रम की कानूनी स्थिति

फैसले में अदालत ने पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि प्राकृतिक संसाधन जनता के हैं। सरकार केवल उनकी संरक्षक है।

पीठ ने कहा,

“लाइसेंस कोई संपत्ति का हस्तांतरण नहीं है। यह केवल एक सीमित, शर्तों के साथ दिया गया उपयोग अधिकार है।”

अदालत ने माना कि भारतीय टेलीग्राफ एक्ट, 1885 के तहत केंद्र सरकार के पास दूरसंचार सेवाओं का “एक्सक्लूसिव प्रिविलेज” है। लाइसेंस उसी विशेषाधिकार का सीमित हिस्सा है, न कि स्वामित्व।

IBC बनाम टेलीकॉम कानून

बैंकों की ओर से दलील दी गई कि एक बार स्पेक्ट्रम को कंपनी की अमूर्त संपत्ति माना जाए, तो वह IBC की धारा 18 के तहत रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के नियंत्रण में आ जाता है।

लेकिन कोर्ट ने यह तर्क नहीं माना।

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पीठ ने कहा,

“IBC का उद्देश्य दिवाला समाधान है, न कि प्राकृतिक संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का पुनर्गठन।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग गाइडलाइंस, 2015 के तहत बकाया चुकाए बिना स्पेक्ट्रम का हस्तांतरण संभव नहीं।

सरकार का बकाया: ऑपरेशनल डेब्ट या कुछ और?

यह भी बहस हुई कि लाइसेंस शुल्क और AGR बकाया “ऑपरेशनल डेब्ट” है या नहीं।

सरकार का कहना था कि यह संप्रभु अधिकार से जुड़ा भुगतान है, न कि सामान या सेवा के बदले लिया गया शुल्क।

कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लिया और माना कि सरकार की भूमिका महज एक कर्जदाता की नहीं, बल्कि लाइसेंसदाता और ट्रस्टी की है।

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अदालत का अंतिम निष्कर्ष

सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • स्पेक्ट्रम एक प्राकृतिक संसाधन है, जिसकी मालिक जनता है।
  • सरकार उसका ट्रस्टी है और नियंत्रण उसके पास रहेगा।
  • लाइसेंस से कंपनियों को स्वामित्व नहीं मिलता, केवल सीमित उपयोग अधिकार मिलता है।
  • IBC का सहारा लेकर सरकार के बकाया को “वाइप ऑफ” नहीं किया जा सकता।
  • स्पेक्ट्रम को कंपनी की संपत्ति मानकर दिवाला प्रक्रिया में बेचना या हस्तांतरित करना कानून के खिलाफ होगा।

पीठ ने कहा,

“डिफॉल्ट करने वाली कंपनियां IBC का इस्तेमाल कर अपनी सार्वजनिक देनदारियों से बच नहीं सकतीं।”

इसी के साथ अदालत ने अपीलों का निपटारा कर दिया।

Case Title: State Bank of India v. Union of India & Ors.

Case No.: Civil Appeal No. 1810 of 2021 (with connected matters)

Decision Date: 2026 (2026 INSC 153)

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