सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक दिलचस्प मोड़ आया, जब 1994 के एक पुराने मामले में दी गई सजा को कानूनी आधार ही न होने के कारण रद्द कर दिया गया। अदालत ने साफ कहा—जब जिस कानून के तहत मुकदमा दर्ज हुआ, वह उस समय लागू ही नहीं था, तो सजा टिक नहीं सकती।
यह फैसला जस्टिस बी.वी. नागरथ्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनाया। मामला महाराष्ट्र में सरकारी कोटे के सीमेंट के कथित अवैध भंडारण से जुड़ा था।
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मामले की पृष्ठभूमि
घटना 24 मार्च 1994 की है। आरोप था कि पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) को सरकारी काम के लिए जो सीमेंट दिया गया था, उसका कुछ हिस्सा रास्ते में ही “डायवर्ट” कर दिया गया। पुलिस को सूचना मिली कि दो ट्रकों से सीमेंट उतारकर उसे निजी गोदाम में रखा जा रहा है।
छापे में 365 बोरी सीमेंट बरामद होने का दावा किया गया। बाद में 25 और बोरी मिलने की बात सामने आई। पुलिस ने इसे सरकारी कोटे का सीमेंट बताते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act) की धारा 3 और 7 के तहत मामला दर्ज किया।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को एक साल की कठोर कैद और 100 रुपये जुर्माने की सजा दी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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अदालत में क्या हुआ?
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि 1 मार्च 1989 से सीमेंट पर सरकारी नियंत्रण हटा लिया गया था। यानी कीमत, बिक्री और वितरण पर जो सख्त नियम पहले थे, वे लागू नहीं रहे।
वकील ने कहा, “जब 1994 में कथित घटना हुई, उस समय कोई वैध नियंत्रण आदेश लागू ही नहीं था। ऐसे में धारा 7 के तहत सजा देना कानूनन संभव नहीं है।”
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित ही नहीं कर पाया कि उस तारीख को कोई नियंत्रण आदेश प्रभावी था या सीमेंट की ‘नियंत्रित कीमत’ क्या थी।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि बड़ी मात्रा में सीमेंट मिला था और आरोपी यह नहीं बता पाए कि वह उनके पास कैसे आया। इसलिए सजा सही है।
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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
पीठ ने विस्तृत कानूनी विश्लेषण किया। अदालत ने 1989 के संशोधन आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उस तारीख से सीमेंट पर मूल्य और वितरण नियंत्रण हटा दिया गया था। 1990 में राज्यों को दी गई लाइसेंस संबंधी शक्तियां भी वापस ले ली गईं।
फैसले में कहा गया, “जिस दिन कथित अपराध हुआ, उस दिन कोई प्रभावी नियंत्रण आदेश लागू नहीं था, जिसका उल्लंघन धारा 3 के तहत माना जा सके।”
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जब धारा 3 के तहत कोई वैध और प्रभावी आदेश ही मौजूद नहीं था, तो धारा 7 के तहत दंड देना कानूनी रूप से असंभव है।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि निचली अदालतों ने केवल सबूतों पर ध्यान दिया, लेकिन यह नहीं देखा कि अपराध का कानूनी आधार ही मौजूद था या नहीं।
जांच एजेंसी पर टिप्पणी
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि रिकॉर्ड पर यह पाया गया कि सरकारी काम के लिए आवंटित सीमेंट निजी गोदाम में मिला था।
फिर भी कोर्ट ने कहा, “यदि सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग या गबन जैसे आरोप बनते हैं, तो भारतीय दंड संहिता के तहत कार्रवाई हो सकती थी। लेकिन इस मामले में वह रास्ता अपनाया ही नहीं गया।”
पीठ ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी ने उचित धाराएं नहीं लगाईं और इसी कारण पूरा मामला कमजोर पड़ गया।
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अंतिम निर्णय
इन सभी कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। दोनों आरोपियों को बरी कर दिया गया।
अदालत ने आदेश दिया कि यदि कोई जुर्माना जमा किया गया है तो वह वापस किया जाए और जमानत बांड निरस्त किए जाएं।
Case Title: Manoj vs State of Maharashtra & Anr. (With Prakash vs State of Maharashtra & Anr.)
Case No.: Criminal Appeal No. 1630 of 2015 & Criminal Appeal No. 1631 of 2015
Decision Date: February 13, 2026










