रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में बुजुर्ग माता-पिता के पक्ष में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने डिप्टी कमिश्नर, रामगढ़ द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बेटे और बहू को राहत दी गई थी। मामला माता-पिता और बेटे के बीच संपत्ति और रहने के अधिकार को लेकर था, जिसे माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत देखा गया। अदालत ने साफ कहा कि यह कानून बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान के लिए है, न कि उनके खिलाफ इस्तेमाल के लिए।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता लखन लाल पोद्दार (75) और उनकी पत्नी उमा रानी पोद्दार (72) रामगढ़ के रहने वाले हैं। यह घर उनकी खुद की कमाई से बना हुआ बताया गया। सेवानिवृत्ति के बाद वे वहीं रह रहे थे। दंपती का आरोप था कि उनका बेटा और बहू उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं और शांति से रहने नहीं दे रहे।
इस पर उन्होंने सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के सामने 2022 में मामला दायर किया। जांच के बाद अधिकारी ने बेटे और बहू को घर खाली करने का आदेश दिया। बाद में बेटे-बहू इस आदेश के खिलाफ अपील में गए, जिस पर डिप्टी कमिश्नर ने 2024 में पहले के आदेश में बदलाव करते हुए उन्हें राहत दे दी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए बुजुर्ग दंपती हाईकोर्ट पहुंचे।
अदालत की सुनवाई और सवाल
हाईकोर्ट ने इस केस में एक अहम सवाल उठाया-क्या अदालत के आदेश से अपील का अधिकार बनाया जा सकता है, जब कानून में वह अधिकार साफ तौर पर न दिया गया हो? कोर्ट ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि “मैंडेमस से न तो कोई नई अथॉरिटी बनाई जा सकती है और न ही नया अधिकार।”
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न्यायमूर्ति राजेश कुमार की बेंच ने कहा कि इस कानून में अपील का अधिकार मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों को दिया गया है, न कि उनके बच्चों को। हालांकि, पहले की सुनवाई में दोनों पक्षों की सहमति से अपील सुनी गई थी। फिर भी, अदालत ने मामले के मूल उद्देश्य पर ध्यान दिया।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
अदालत ने कहा कि यह संपत्ति बुजुर्ग दंपती की खुद की कमाई की है और रिपोर्ट से साफ है कि दोनों पक्ष एक साथ नहीं रह सकते। बेंच ने टिप्पणी की,
“जब एक ही घर में साथ रहना संभव नहीं है, तो कानून का साफ मतलब है कि घर का अधिकार उसी के पास होना चाहिए जिसने इसे अपनी मेहनत से बनाया है।”
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कोर्ट ने यह भी कहा कि यह कानून बुजुर्गों को “सुरक्षित और शांत जीवन” देने के लिए बनाया गया है। जज ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें बुजुर्गों की सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार पर जोर दिया गया था। अदालत ने यह जोड़ा कि अगर बेटा-बहू विरासत का लाभ चाहते हैं, तो उनके ऊपर यह जिम्मेदारी भी है कि वे माता-पिता को सम्मान और सुरक्षित माहौल दें।
फैसला
सभी तथ्यों और कानून के उद्देश्य को देखते हुए हाईकोर्ट ने डिप्टी कमिश्नर, रामगढ़ का 23 फरवरी 2024 का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि वह आदेश माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के मकसद के खिलाफ था।
इसके साथ ही बुजुर्ग दंपती की याचिका स्वीकार कर ली गई और मामला यहीं समाप्त कर दिया गया।
Case Title:- Lakhan Lal Poddar & Anr. vs State of Jharkhand & Ors.
Case Number:- W.P.(C) No. 2353 of 2024
Date of Judgment:- 10 February 2026










