इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम आदेश में स्पष्ट किया कि जब कोई न्यायिक अधिकारी अपना न्यायिक कार्य कर रहा होता है, तो वह ज़िला मजिस्ट्रेट, ज़िला पुलिस प्रमुख और यहां तक कि राज्य के राजनीतिक प्रमुख से भी ऊपर होता है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेशों की अनदेखी करना “माफ़ करने योग्य नहीं” है और यह कानून की सत्ता को सीधी चुनौती है।
यह टिप्पणी जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने ललितपुर से जुड़े अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान की।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी सानू उर्फ राशिद द्वारा दायर जमानत याचिका से हुई। परिवार का आरोप था कि उसे 14 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया, लेकिन गिरफ्तारी दर्ज नहीं की गई।
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उसकी बहन ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), ललितपुर के समक्ष आवेदन देकर अवैध हिरासत की शिकायत की। CJM ने संबंधित थाना प्रभारी (SHO) और जांच अधिकारी (IO) को पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
कई आदेशों के बावजूद फुटेज पेश नहीं किया गया। महिला सह-आरोपी की सुबह 4 बजे गिरफ्तारी पर भी CJM ने सवाल उठाया।
4 फरवरी 2026 को मामला हाईकोर्ट पहुंचा। SHO और IO अदालत में पेश हुए और बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने दलील दी कि CCTV की सीमित स्टोरेज क्षमता के कारण फुटेज स्वतः डिलीट हो गया।
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पीठ ने इस सफाई को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा,
"यहां सवाल केवल संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन का ही नहीं है, बल्कि न्यायिक आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा का भी है, जो कानून के अधिकार को कम करता है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारी आम नागरिक के लिए पहली सुरक्षा पंक्ति होते हैं और उनकी तुलना प्रशासनिक अधिकारियों से नहीं की जा सकती।
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न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उच्च न्यायालय ने दोनों अधिकारियों को जानबूझकर अवज्ञा करने के लिए अवमानना का दोषी ठहराया। हालांकि, सजा में नरमी बरतते हुए, न्यायालय ने निर्देश दिया कि वे शाम 4:00 बजे न्यायालय के उठने तक न्यायालय कक्ष के भीतर ही हिरासत में रहें।
कोर्ट ने पाया कि आवेदक को तीन दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। राज्य सरकार को एक लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया, जिसे संबंधित अधिकारियों से वसूलने की छूट भी दी गई।
साथ ही, आवेदक को इस शर्त पर जमानत दी गई कि वह 15 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की वित्त कंपनी को 15 लाख रुपये स्थानांतरित करेगा।










