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बंगाली बोलने पर निर्वासन नहीं किया जा सकता: दिल्ली पुलिस द्वारा बंगाल के प्रवासी परिवार को बांग्लादेश भेजे जाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल से मांगा हलफनामा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल के बिरभूम जिले से संबंधित एक प्रवासी परिवार की गिरफ्तारी और निर्वासन के मामले में केंद्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल सरकार से हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने कहा कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

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बंगाली बोलने पर निर्वासन नहीं किया जा सकता: दिल्ली पुलिस द्वारा बंगाल के प्रवासी परिवार को बांग्लादेश भेजे जाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल से मांगा हलफनामा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और पश्चिम बंगाल राज्य को निर्देश दिया है कि वे एक हैबियस कॉर्पस याचिका के संबंध में विस्तृत हलफनामा दायर करें, जिसमें बिरभूम जिले के एक बंगाली भाषी प्रवासी परिवार की गिरफ्तारी और निर्वासन का मामला उठाया गया है। यह याचिका उनके रिश्तेदारों द्वारा दाखिल की गई थी, जिन्होंने दिल्ली पुलिस पर अवैध हिरासत और जबरन निर्वासन का आरोप लगाया।

यह मामला अमीर खान बनाम भारत संघ एवं अन्य के रूप में WPA(H)/51/2025 नंबर से दर्ज है। इस पर सुनवाई न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति रीतोब्रतो कुमार मित्रा की खंडपीठ कर रही थी। अदालत को यह जानकारी दी गई कि इसी विषय पर दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक समान याचिका लंबित है, जिसकी जानकारी कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत याचिका में नहीं दी गई थी।

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किसी अन्य हाईकोर्ट में लंबित समान कार्यवाही को छिपाना अदालत को गुमराह करने जैसा है, अदालत ने इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए कहा।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने बताया कि याचिका दाखिल करने के बाद दिल्ली पुलिस ने याचिकाकर्ता के अन्य रिश्तेदारों को भी हिरासत में लिया, लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। इससे पुलिस की कार्रवाई पर और भी सवाल खड़े हो गए।

दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि चूंकि एक जैसी घटनाएं पहले से ही दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं, इसलिए इस याचिका को खारिज किया जाना चाहिए। लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट की पीठ ने ऐसा करने से इनकार करते हुए सभी पक्षों से विस्तृत हलफनामा मांगा ताकि तथ्य स्पष्ट हो सकें और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं।

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या ये लोग भारतीय नागरिक हैं या नहीं। उन्होंने अदालत से यह अनुरोध किया कि हलफनामों में यह बताया जाए कि अब तक कितने बंगाली भाषी लोगों को हिरासत में लिया गया और कितनों को निर्वासित किया गया।

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हिरासत में लेने का फैसला कौन करेगा? यह अधिकार पुलिस या किसी कांस्टेबल का नहीं है। आप किसी को केवल इसलिए नहीं उठा सकते क्योंकि वह बंगाली बोल रहा है। इसकी एक प्रक्रिया होती है। ऐसे तीन-चार मामले काफी चिंताजनक हैं, बंदोपाध्याय ने अदालत में कहा।

इसके जवाब में डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया,
"पाहलगाम हमले के बाद कश्मीर में भी कई लोगों को हिरासत में लिया गया था, लेकिन सभी को बाद में छोड़ दिया गया। बंगाली बोलने वाले लोगों को केवल इस वजह से नहीं उठाया गया और निर्वासित नहीं किया गया। सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया था, लेकिन ज्यादातर को रिहा कर दिया गया।"

कोर्ट ने दोनों पक्षों की चिंताओं पर ध्यान देते हुए कहा कि पूरे मामले में पारदर्शिता और स्पष्टता जरूरी है। अदालत ने सभी पक्षों को निर्देश दिया कि वे अपना हलफनामा दायर करें और मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की।

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यह मामला अब नागरिकता की जांच, भाषा के आधार पर कार्रवाई और निर्वासन की वैधानिक प्रक्रिया पर व्यापक बहस का कारण बन गया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में सक्षम अधिकारियों द्वारा उचित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

मामला संख्या: WPA(H)/51/2025
मामला: अमीर खान बनाम भारत संघ एवं अन्य

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