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दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले पति से औपचारिक तलाक न होने के बावजूद महिला को भरण-पोषण देने के अधिकार को बरकरार रखा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी को ₹3,000 मासिक भरण-पोषण देने का परिवार अदालत का आदेश बरकरार रखते हुए पति की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।

Shivam Y.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले पति से औपचारिक तलाक न होने के बावजूद महिला को भरण-पोषण देने के अधिकार को बरकरार रखा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पारिवारिक अदालत द्वारा पत्नी को दिए गए मासिक भरण-पोषण आदेश को बरकरार रखते हुए पति की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 सामाजिक न्याय का प्रावधान है और इसे संकीर्ण तरीके से नहीं पढ़ा जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, दोनों पक्षों की शादी 26 मई 2009 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। शादी के बाद दोनों दिल्ली में साथ रहने लगे, लेकिन कुछ समय बाद रिश्तों में तनाव आ गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति उसके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार करता था, जिसके बाद वह अपनी मां के घर रहने लगी।

पत्नी ने अदालत में कहा कि उसके पास आय का कोई साधन नहीं है और वह पूरी तरह अपने परिवार पर निर्भर है। इसके बाद उसने भरण-पोषण की मांग करते हुए परिवार अदालत का दरवाजा खटखटाया था। परिवार अदालत ने फरवरी 2018 में पति को पत्नी को ₹3,000 प्रतिमाह देने का आदेश दिया था।

पति की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि पत्नी पहले से विवाहित थी और उसने अपने पहले विवाह तथा उससे जुड़े मुकदमों की जानकारी छिपाई। यह भी कहा गया कि पत्नी को पहले पति से औपचारिक तलाक नहीं मिला था, इसलिए वह कानूनी रूप से “पत्नी” की श्रेणी में नहीं आती।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि परिवार अदालत के पास क्षेत्राधिकार नहीं था क्योंकि शादी मुजफ्फरनगर में हुई थी। साथ ही, ₹3,000 मासिक भरण-पोषण तय करने का कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि वह बेरोजगार था।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि परिवार अदालत ने इन सभी मुद्दों पर विस्तार से विचार किया था। अदालत ने नोट किया कि पत्नी ने बताया था कि वह अपने पहले पति के साथ केवल एक महीने रही थी और पिछले 12 वर्षों से उसका उससे कोई संपर्क नहीं था।

अदालत ने यह भी माना कि वर्तमान पति को इन परिस्थितियों की जानकारी थी और दोनों ने सार्वजनिक रूप से विवाह किया था।

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 CrPC महिलाओं को आर्थिक असुरक्षा और बेघर होने की स्थिति से बचाने के लिए बनाई गई है।

फैसले में कहा गया,

“धारा 125 CrPC सामाजिक न्याय का उपाय है और लाभकारी प्रावधानों की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।”

जस्टिस बनर्जी ने पाया कि परिवार अदालत के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि, अनियमितता या मनमानी नहीं है। अदालत ने कहा कि पुनर्विचार याचिका में हस्तक्षेप का दायरा सीमित होता है और इस मामले में आदेश रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पति की पुनर्विचार याचिका और लंबित आवेदन खारिज कर दिए।

Case Details:

Case Title: RK v. PS

Case Number: CRL.REV.P. 485/2018

Judge: Justice Saurabh Banerjee

Decision Date: May 6, 2026

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