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दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्नी के लिखित बयान को पुनः सक्रिय करने वाले पारिवारिक न्यायालय के आदेश के विरुद्ध पति की अपील खारिज कर दी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि पति अपनी ही गलती का फायदा नहीं उठा सकता और पत्नी का लिखित जवाब दाखिल करने का अधिकार बहाल रखने का आदेश सही माना।

Shivam Y.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्नी के लिखित बयान को पुनः सक्रिय करने वाले पारिवारिक न्यायालय के आदेश के विरुद्ध पति की अपील खारिज कर दी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी पक्ष अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता। अदालत ने उस पति की अपील खारिज कर दी, जिसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें पत्नी को लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करने की अनुमति दोबारा दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला श्री निखिल भाटिया बनाम सुश्री सोनम सिंह भाटिया से जुड़ा है। दोनों की शादी फरवरी 2019 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी और उनका एक बेटा भी है। बाद में वैवाहिक विवाद बढ़ने पर पत्नी बच्चे के साथ अलग रहने लगी। इसके बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक याचिका दायर की।

फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2024 में पति को पत्नी को 11,000 रुपये मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया था और पत्नी को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी थी। हालांकि, पति ने तय समय पर यह राशि नहीं दी। इसी बीच पत्नी भी समय पर जवाब दाखिल नहीं कर सकी। बाद में पति की मांग पर सितंबर 2024 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी का बचाव पक्ष समाप्त कर दिया था।

इसके बाद पत्नी ने उस आदेश को रद्द करने और अपना जवाब दाखिल करने का अधिकार बहाल करने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने फरवरी 2026 में पत्नी की मांग स्वीकार कर ली। इसी आदेश को पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि पति खुद फैमिली कोर्ट के आदेश का पालन करने में विफल रहा था, इसलिए वह पत्नी की देरी का फायदा नहीं उठा सकता।

पीठ ने कहा,

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 का मूल सिद्धांत यही है कि कोई पक्ष अपनी ही गलती का लाभ नहीं ले सकता।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि मुकदमे का खर्च समय पर न मिलने से पत्नी को अपना पक्ष ठीक से रखने में कठिनाई हुई। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर उसका बचाव समाप्त करना उचित नहीं था।

पति की ओर से कहा गया था कि पत्नी ने लगभग एक साल बाद आदेश को चुनौती दी और बिना देरी माफी आवेदन के राहत मांगी, इसलिए उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था। इसके अलावा, पति ने एक पूर्व फैसले का हवाला देकर कहा कि परिवारिक मामलों में समयसीमा का पालन जरूरी है।

लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि जिस पक्ष ने खुद अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया, वह दूसरे पक्ष की देरी पर कठोर रुख नहीं अपना सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लिखित जवाब दाखिल करने की समयसीमा पूर्ण रूप से अनिवार्य नहीं है और विशेष परिस्थितियों में देरी माफ की जा सकती है।

हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने न्यायसंगत तरीके से अपना विवेक इस्तेमाल किया और पत्नी को जवाब दाखिल करने की अनुमति देकर कोई गलती नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की जा रही है और फैमिली कोर्ट अब मूल विवाद का जल्द निपटारा करेगा।

इसके साथ ही पति की अपील खारिज कर दी गई।

Case Details:

Case Title: NB vs. SB

Case Number: MAT.APP.(F.C.) 63/2026

Judges: Justice Vivek Chaudhary and Justice Rajneesh Kumar Gupta

Decision Date: May 5, 2026

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