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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुजुर्ग ससुराल वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा की कार्यवाही रद्द की, विधवा की कानूनी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण और परेशान करने वाला बताया

श्रीमती उषा शर्मा एवं अन्य बनाम स्वाति शर्मा - दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुजुर्ग ससुराल वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला खारिज कर दिया, विधवा को कानून का दुरुपयोग करने के लिए फटकार लगाई और 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

Shivam Y.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुजुर्ग ससुराल वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा की कार्यवाही रद्द की, विधवा की कानूनी कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण और परेशान करने वाला बताया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सख्त टिप्पणी करते हुए उस महिला को फटकार लगाई है जिसने अपने दिवंगत पति के बुजुर्ग माता-पिता को वर्षों बाद घरेलू हिंसा के मुकदमे में दोबारा घसीट लिया, जबकि वह खुद अलग रह रही थीं और अब दोबारा विवाह भी कर चुकी हैं।

जस्टिस अरुण मोंगा ने 29 अगस्त 2025 को उषा शर्मा और उनके पति की याचिका सुनते हुए उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया और कहा कि महिला की यह हरकत “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है।

पृष्ठभूमि

उषा शर्मा और उनके पति ने दिसंबर 2021 में अपने इकलौते बेटे अपूर्व को खो दिया था। अपूर्व की शादी 2011 में स्वाति शर्मा से हुई थी और उनका एक बच्चा भी है। शादी के कुछ साल बाद मतभेद बढ़े और स्वाति ने 2017 में ससुराल छोड़ दिया, आरोप लगाते हुए कि उसे दहेज के लिए परेशान किया गया। अगस्त 2021 में उन्होंने अपने ससुराल के पांच सदस्यों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दायर कर दिया।

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महिला अदालत ने शुरुआती जांच के बाद पाया कि उषा शर्मा दंपति 2019 से अलग रह रहे थे और स्वाति के पास कभी नहीं गए। इसलिए अदालत ने उन्हें मामले से हटा दिया था। उस समय स्वाति ने इस फैसले पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।

अदालत की टिप्पणियां

करीब एक साल बाद स्वाति ने चुपचाप एक पुनरीक्षण याचिका दायर की और बिना किसी नोटिस के सत्र न्यायालय ने नवंबर 2022 में बुजुर्ग ससुराल पक्ष को फिर से आरोपी बना दिया। इसके बाद महिला अदालत ने उन्हें दोबारा तलब कर लिया।

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जस्टिस मोंगा ने कहा कि यह पुनरीक्षण याचिका 10 महीने से ज्यादा की देरी से दाखिल की गई, जबकि स्वाति के पास 30 दिन के भीतर अपील करने का वैधानिक अधिकार था। उन्होंने कहा,

"जब एक विशेष वैधानिक उपाय उपलब्ध था, तो इतनी विलंबित पुनरीक्षण याचिका प्रथमदृष्टया स्वीकार्य नहीं थी।"

न्यायाधीश इस बात से भी चिंतित थे कि बुजुर्गों को बिना सुने ही आरोपी बना दिया गया। उन्होंने कहा,

"दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 401(2) साफ कहती है कि किसी प्रभावित पक्ष को सुने बिना उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जा सकता," और सत्र न्यायालय के आदेश को “कानूनन अस्थिर” बताया।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का आदेश और उसके आधार पर जारी महिला अदालत के सम्मन दोनों को रद्द कर दिया। साथ ही, अदालत ने स्वाति शर्मा पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और इसे “कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेकर किया गया शुद्ध उत्पीड़न” करार दिया।

जस्टिस मोंगा ने असाधारण रूप से तीखे शब्दों में कहा,

"अपने युवा बेटे की मौत के बाद भी वृद्ध सास-ससुर को लगातार मुकदमेबाजी में उलझाए रखना, और वह भी तब जब वह खुद आराम से पुनर्विवाह कर चुकी हैं - इसे वह न्याय कहती हैं। ऐसे कार्यवाही को अन्यायपूर्ण और अस्वीकार्य कहना भी कम होगा।"

यह फैसला वर्षों से चल रहे इस विवाद का पटाक्षेप करता है और उन शोकाकुल माता-पिता को राहत देता है जिन्हें शुरुआत से ही इस मुकदमे का पक्षकार नहीं होना चाहिए था।

केस का शीर्षक: श्रीमती उषा शर्मा एवं अन्य बनाम स्वाति शर्मा

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