मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर CISF कांस्टेबल की बर्खास्तगी दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखी

अश्वनी कुमार बनाम भारत संघ एवं अन्य। - दिल्ली हाई कोर्ट ने सीआईएसएफ कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी और पहली शादी के वैध रहते हुए दूसरी शादी करने पर बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

Shivam Y.
पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर CISF कांस्टेबल की बर्खास्तगी दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखी

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी, जिसे पहली शादी रहते दूसरी शादी करने पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने 20 अगस्त 2025 को कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी तरह कानूनी और सीआईएसएफ सेवा नियमों के अनुरूप है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अश्वनी कुमार ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि उनकी पहली शादी अक्टूबर 2017 में गाँव के लोगों और गवाहों के सामने एक "विवाह विघटन पत्र" (Marriage Dissolution Deed) पर हस्ताक्षर कर समाप्त हो गई थी। लेकिन अदालत ने साफ किया कि एक बार विधिवत संपन्न हुआ हिंदू विवाह इस तरह अनौपचारिक तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता। वैध तलाक केवल सक्षम न्यायालय के आदेश से ही संभव है, जैसे कि हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के तहत।

Read also:- HP हाईकोर्ट: नाबालिग का आधार पर 18+ दिखाना आरोपी को POCSO मामले में नहीं देगा राहत

मामला सीआईएसएफ नियम, 2001 के नियम 18 पर केंद्रित था, जिसमें कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति, जिसकी पहली शादी कायम है, दूसरी शादी करता है तो उसे अयोग्य माना जाएगा। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह नियम केवल भर्ती के समय लागू होता है, नौकरी में आने के बाद नहीं। अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए एक्स. हेड कांस्टेबल बाज़ीर सिंह बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया।

उस फैसले में अदालत ने कहा था:

"यदि दो पत्नियों वाला व्यक्ति नियुक्ति के लिए भी पात्र नहीं है, तो यह कहना हास्यास्पद होगा कि नौकरी में आने के बाद उसे दूसरी शादी करने की अनुमति है।"

Read also:- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट न्यायिक आदेशों के बावजूद दूसरी मातृत्व अवकाश को अस्वीकार करने पर राज्य विभाग की कड़ी आलोचना की

दिल्ली हाई कोर्ट ने दोहराया कि ऐसे नियमों का उद्देश्य अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है, खासकर सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के कर्मचारियों में।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि बाज़ीर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी थी, जिससे यह मिसाल और मजबूत हो गई। खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास "कोई बचाव नहीं" है, क्योंकि उसकी पहली शादी वैधानिक रूप से कायम थी जब उसने दूसरी शादी की।

हालांकि पहले मामले में दंड को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदला गया था, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि यहाँ ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि याचिकाकर्ता ने सेवा की आवश्यक अवधि पूरी नहीं की थी। आदेश में कहा गया: "हम याचिकाकर्ता की मदद करने में असमर्थ हैं।"

केस का शीर्षक: अश्वनी कुमार बनाम भारत संघ एवं अन्य।

केस नंबर: W.P.(C) 5048/2022

Mobile App

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Install App
CourtBook Mobile App

More Stories