मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामले की जानकारी न देने के आधार पर किसी कर्मचारी को सेवा से हटाना उचित नहीं है, खासकर जब मामला पहले ही समाप्त हो चुका हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला भेरूगिर बनाम मध्य प्रदेश राज्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को अपने पिता की मृत्यु के बाद सहानुभूति नियुक्ति (compassionate appointment) के तहत चपरासी के पद पर नियुक्त किया गया था।
नियुक्ति के समय पुलिस सत्यापन फॉर्म में उन्होंने लंबित आपराधिक मामले से इनकार किया। हालांकि, उनके खिलाफ धारा 498-A IPC के तहत एक मामला दर्ज था, जो वैवाहिक विवाद से संबंधित था। बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और मार्च 2018 में उन्हें बरी कर दिया गया।
इसके बावजूद, पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उन्हें “सरकारी सेवा के लिए अयोग्य” घोषित कर दिया गया और जून 2018 में उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
न्यायालय ने कहा कि सहानुभूति नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल राहत देना होता है, न कि कठोर नियमों के आधार पर नियुक्ति रद्द करना।
कोर्ट ने पाया कि संबंधित आपराधिक मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा था और इसमें नैतिक पतन (moral turpitude) का तत्व नहीं था। साथ ही, याचिकाकर्ता को सेवा समाप्ति से पहले कोई नोटिस भी नहीं दिया गया।
पीठ ने कहा,
“प्राधिकरण को यह संतुष्टि रिकॉर्ड करनी चाहिए थी कि याचिकाकर्ता वास्तव में सेवा के लिए अयोग्य है, मात्र गैर-प्रकटीकरण के आधार पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले ही बरी हो चुका था, तब उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करना उचित नहीं था।
अंततः हाईकोर्ट ने 2 जून 2018, 22 जून 2018 और 18 अप्रैल 2019 के सभी आदेशों को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के सहानुभूति नियुक्ति के मामले पर पुनर्विचार किया जाए और 60 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए।
Case Details:
Case Title: Bherugir vs State of Madhya Pradesh
Case Number: W.P. No. 19107/2019
Judge: Justice Jai Kumar Pillai
Decision Date: 04 May 2026











