नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर स्पष्टता दी—क्या किसी व्यक्ति को कंपनी का सदस्य माना जा सकता है, भले ही उसका नाम औपचारिक रूप से रजिस्टर में दर्ज न हो? अदालत ने परिस्थितियों के आधार पर “हां” में जवाब दिया और कंपनी की अपील खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला डॉ. बैस सर्जिकल एंड मेडिकल इंस्टीट्यूट प्रा. लिमिटेड बनाम धनंजय पांडे से स्टॉक है। कंपनी को वित्तीय स्थिरता का सामना करना पड़ रहा था, तब धनंजय पेंडेज़ ने निवेश का प्रस्ताव दिया था। शर्त यह थी कि उन्हें सपोर्टिव डायरेक्टरेट बनाया जाए और अस्पताल को एक विशेष कार्डियक सेंटर में बदला जाए।
रिकॉर्ड के अनुसार, पांडे को 1998 में मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया गया। उनका दावा था कि 1999 में उन्हें करीब 14.75 लाख शेयर आवंटित किए गए, हालांकि कंपनी ने इस दावे का विरोध किया। बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद पांडे ने कंपनी लॉ बोर्ड में याचिका दायर की।
कंपनी का तर्क था कि चूंकि पांडे का नाम कंपनी के रजिस्टर ऑफ मेंबर्स में दर्ज नहीं था, इसलिए उन्हें “सदस्य” नहीं माना जा सकता और वे कंपनी लॉ बोर्ड के समक्ष याचिका दाखिल करने के पात्र नहीं हैं।
वहीं, पांडे ने कहा कि उन्होंने कंपनी में निवेश किया, उन्हें मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया और कंपनी ने उनके निवेश का उपयोग भी किया-इसलिए उन्हें सदस्य का दर्जा मिलना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की परिस्थितियों का गहराई से विश्लेषण किया। अदालत ने देखा कि:
- पांडे को कंपनी के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी
- उनके निवेश का उपयोग कंपनी के विस्तार में हुआ
- अस्पताल का नाम और पहचान भी उनके व्यवसाय से जुड़ी हुई थी
अदालत ने कहा,
“रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवादी को केवल निवेशक या लेनदार के रूप में नहीं, बल्कि कंपनी के हितधारक के रूप में लगातार माना गया।”
अदालत ने यह भी माना कि कंपनी के व्यवहार और वित्तीय गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि पांडे का हित कंपनी में एक शेयरधारक के रूप में स्वीकार किया गया था।
कंपनी लॉ बोर्ड ने पहले ही यह माना था कि पांडे को सदस्य माना जाना चाहिए और कंपनी को या तो शेयर आवंटित करने या निवेश राशि ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया था।
हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा और कंपनी की आपत्ति को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और कंपनी लॉ बोर्ड के निष्कर्षों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पांडे को कंपनी का सदस्य माना जाना उचित है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“हम यह मानते हैं कि हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष सही है कि प्रतिवादी को कंपनी का सदस्य मानकर कार्यवाही करने का अधिकार था।”
इसके साथ ही कोर्ट ने कंपनी की अपील खारिज कर दी। साथ ही निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट में जमा राशि ब्याज सहित धनंजय पांडे को जारी की जाए। मामले से जुड़ी सभी लंबित याचिकाएं भी निपटा दी गईं।
Case Details:
Case Title: Dr. Bais Surgical and Medical Institute Pvt. Ltd. & Ors. v. Dhananjay Pande
Case Number: Civil Appeal No. 8973 of 2010 (with 9456 of 2010)
Judges: Justice Pamidighantam Sri Narasimha & Justice Alok Aradhe
Decision Date: May 04, 2026











