मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति के कई रिश्तेदारों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हालांकि अदालत ने पति को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने कहा कि वैवाहिक मामलों में अदालत को पत्नी की शिकायत और पति के रिश्तेदारों को बिना पर्याप्त आधार के आरोपी बनाए जाने की संभावना के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
मामले की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता महिला ने 30 जनवरी 2023 को थाना ऑल वूमेन पुलिस स्टेशन, बोडिनायकनूर में शिकायत दर्ज कराई थी। जांच के बाद पुलिस ने पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498A, 294(b), 323, 324 और 506(ii) के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। वहीं अन्य रिश्तेदारों पर केवल धारा 498A के तहत आरोप लगाए गए।
महिला का आरोप था कि विवाह के बाद पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और उसके रिश्तेदारों ने उसका समर्थन किया। शिकायत में नवंबर 2022 की कुछ कथित घटनाओं का भी उल्लेख किया गया था, जिनमें मारपीट और मोबाइल फोन को लेकर विवाद शामिल था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पति के खिलाफ लगाए गए आरोप केवल सामान्य आरोप नहीं हैं, बल्कि शिकायत में कुछ विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
अदालत ने कहा, “पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता या अतिशयोक्ति का निर्धारण इस स्तर पर नहीं किया जा सकता। यह ट्रायल का विषय है।”
कोर्ट ने माना कि पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों में पर्याप्त तथ्यात्मक आधार मौजूद है, इसलिए इस चरण पर कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, अदालत ने पाया कि पति के रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोप अत्यंत सामान्य और अस्पष्ट हैं। शिकायत में यह नहीं बताया गया कि किस रिश्तेदार ने कब, कहाँ और किस प्रकार कथित क्रूरता की।
अदालत ने कहा कि केवल यह कहना कि रिश्तेदारों ने पति का “समर्थन” किया या मानसिक प्रताड़ना में साथ दिया, धारा 498A के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा:
“सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अभियोजन जारी नहीं रखा जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति-पत्नी अलग रह रहे थे और संयुक्त परिवार में नहीं रहते थे। ऐसे में दूर रहने वाले रिश्तेदारों के खिलाफ ठोस आरोपों का अभाव महत्वपूर्ण हो जाता है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि कथित घटनाओं और शिकायत दर्ज कराने के बीच लगभग 80 दिनों का अंतर है।
हालांकि अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों में देरी को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि अक्सर पीड़ित पक्ष पहले समझौते या सुलह का प्रयास करता है। इसलिए केवल देरी के आधार पर पति के खिलाफ मामला समाप्त नहीं किया जा सकता।
मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आरोपी संख्या 2 से 7 और 10 के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ आरोप अस्पष्ट, सामान्य और आवश्यक कानूनी तत्वों से रहित हैं।
वहीं आरोपी संख्या 1 यानी पति को राहत देने से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सुनवाई ट्रायल में की जानी चाहिए।
न्यायिक मजिस्ट्रेट, बोडिनायकनूर को कानून के अनुसार मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया।
Case Details
Case Title: S. Sathish Kumar & Ors. v. State of Tamil Nadu & Anr.
Case Number: Crl.O.P.(MD) No.2451 of 2024
Judge: Justice L. Victoria Gowri
Decision Date: June 1, 2026

